Friday, July 10, 2009

ये सब जनता की भलाई के लिए है!

सुप्रीमकोर्ट ने नोएडा में बन रही मायावती की मूर्तियों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। सुप्रीमकोर्ट का कहना है कि वो तब तक इसमें दखल नहीं दे सकती जब तक ये साबित न हो जाए कि इसमें जनता के पैसे का गलत इस्तेमाल हो रहा है। अब मुझे समझ में नहीं आता कि जनता के पैसे से सैकड़ो हाथी और मूर्तियां बनवाना दुरुपयोग नहीं तो क्या जनता की भलाई है?

लगे हाथ इसे भी पढ़ लीजिए - पत्थर के सनम

Thursday, July 09, 2009

जरदारी की सरदारी में ही भला है

जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है – ये मैंने पिछले साल 15 दिसंबर को लिखा था। और, आज 7 महीने के बाद ये बात साबित भी हो रही है कि जरदारी को साथ लेकर भारत वो कर सकता है जो,
62 सालों में सारी मेहनत-मशक्कत के बाद भारतीय सरकारें नहीं कर सकीं।


भारतीय विदेश नीति के जानकार पता नहीं क्यों जरदारी के साथ संवाद बेहतर बनाने का काम नहीं कर पा रहे हैं। जबकि, जरदारी ने वो बात मान ली है जिसे मनवाने के लिए भारत संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से लेकर दुनिया के हर थोड़ा भी दादा टाइप देश के पास पाकिस्तानी आतंकवाद के सबूतों का पुलिंदा लिए घूम रहा था। अमेरिकी अखबार the Washington post में जरदारी ने माना है कि पाकिस्तान ने छोटे-छोटे हित पूरे करने के लिए सरकारी नीति के तहत आतंकवादियों को पाला-पोसा-बढ़ाया। और, ये आतंकवादी पाकिस्तानी अवाम के साथ इस तरह से जुड़े हुए थे कि अमेरिका के ट्विन टावर पर हुए 9/11 हमले के पहले तक इन्हें हीरो की तरह देखा जाता था।


जरदारी ने एक और बात कही है कि दुनिया की दादागिरी में पाकिस्तान-अफगानिस्तान बर्बाद हो गए। ये भी एक ऐसी बाच है जिसे दुनिया अच्छे से जानती-मानती है लेकिन, तालिबान-अलकायदा-आतंकवादियों के अलावा कुछ रक्षा विश्लेषकों की ही जुबान से ये सुनाई देता था। अब खुद पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने ये कह दिया कि सोवियत संघ और अमेरिका के शीत युद्ध का शिकार पाकिस्तान और अफगानिस्तान हुए हैं।



जरदारी का ये बयान और कुछ दिन पहले दिया गया हिलेरी क्लिंटन का बयान एक दूसरे को और सच बनाता है। अमेरिकी विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि पिछले 2-3 दशकों से अमेरिकी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान में आतंकवादियों के सफाए के बजाए उन्हें बढ़ाने में हो रहा था। अब इन तीनों बयानों को साथ रखिए-


पाकिस्तान सरकार छोटे हितों को पूरा करने के लिए आतंकवादियों को पाल पोसकर बड़ा कर रही थी।

अमेरिका-सोवियत संघ के शीत युद्ध में अफगानिस्तान-पाकिस्तान, आतंकवादियों का गढ़ बन गए।

और, खुद हिलेरी का कहना कि आतंकवादियों को सफाए के लिए दी जा रही अमेरिकी मदद पाकिस्तान में आतंकवादियों को बढ़ाने में की जा रही थी।



साफ है दुनिया के दादा देश एशिया में अपना अड्डा मजबूत करने के लिए भारत-पाकिस्तान को लुरियाने में जुटे थे। भारत-पाकिस्तान का धर्म के आधार पर हुआ अलगाव सोवियत संघ-अमेरिका को ये आधार अपने आप ही दे दे रहा था कि भारत-पाकिस्तान एक दूसरे से लड़ने में उनकी मदद मांगते रहें। अब सोवियत संघ भले खत्म हो गया। लेकिन, अमेरिका ने खुद ही ये नीति बना ली कि दोनों की पटका-पटकी को बढ़ावा देते रहो। बचा-खुचा काम पाकिस्तान को बढ़ावा देकर चीन करता रहता ही है। वैसे अब चीन में हो रहे दंगों पर चीन सरकार ने पाकिस्तान से सफाई मांगी है।


कश्मीर जैसा नासूर दोनों देशों के पास राष्ट्रवादी होने का सबसे बड़ा आधार बनाता ही था। अच्छा हुआ कि हिंदुस्तानी संस्कृति, संस्कार नफरत की आग में इतना नहीं जले कि वो, आतंकवादी तैयार करने की ओर बढ़ते। लेकिन, सिर्फ मजहबी आधार पर बना पाकिस्तान इससे बच नहीं पाया। अफगानिस्तान-पाकिस्तान की अस्थिर सत्ता, लोकतंत्र का अभाव आतंकवाद की आग के लिए विशुद्ध देसी घी साबित होता रहा। और, इस आग में पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जलने के साथ तेज लपटों से आज भी भी भारत झुलस रहा है।


कश्मीर में बेवजह आग लगी हुई है। उमर अब्दुल्ला जैसा नौजवान-आगे की सोच रखने वाला मुख्यमंत्री भी असहाय है। उसे टीवी पर आकर सफाई देनी पड़ रही है कि CRPF और पैरामिलिट्री की 75 कंपनियां तैनात हैं उन्हें हटाकर राज्य पुलिस की सिर्फ 25 कंपनियों से कैसे काम चल पाएगा। लेकिन, अलगाववादियों के लिए ये सबसे अच्छा समय होता है। वो, दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों को काबू करने के लिए चली गोलियों से हमारा कश्मीरी नौजवान हलाल होता है और अलगाववादियों की बात के समर्थन में और सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की मजबूती बढ़ती ही जाती है।


बस अच्छी बात ये है कि कश्मीरी अवाम का लोकतंत्र में भरोसा टूटा नहीं है। लेकिन, सरकार, सेना के खिलाफ ढेरों हवाई किस्से उनके जनमानस में घर कर गए हैं। मैं करीब ढाई साल पहले शादी के बाद श्रीनगर गया था तो, डल लेक पर जिस बोट में रुका था। उसके मालिक ने जो किस्सा सुनाया वो, चौंकाने वाला था। बेहद अच्छे स्वभाव के सुपर डीलक्स बोट के मालिक ने कहाकि- कश्मीर में आतंकवाद है ही नहीं। ये तो हिमाचल प्रदेश के सेब कारोबारियों और सेना की मिलीभगत हैं। क्योंकि, हिमाचल के सेब कारोबारियों को डर है कि कश्मीर में माहौल अच्छा रहा तो, कश्मीरी सेबों के आगे उनके सेब कौन खाएगा। ये सिर्फ बानगी है- ऐसे हजारों मनगढ़ंत नफरत भरने वाले किस्से कश्मीरियों के मानस का हिस्सा बन चुके हैं।


अब 62-63 सालों की नफरत के बाद जब आग लगाते-लगाते पाकिस्तानी सरकार का हाथ खुद जलने लगा तो, जरदारी कह रहे हैं कि बातचीत, शांति उनका सबसे बड़ा हथियार है। अच्छा है भारत सरकार को भी 5 साल के लिए जनादेश मिला है। स्थिर सरकार है जरदारी को साथ लीजिए, संवाद बेहतर कीजिए। ISI और कठमुल्लाओं के खिलाफ जूझ रह जरदारी का साथ दीजिए। अंतरराष्ट्रीय मंचों के लिए हिलेरी क्लिंटन जैसों को आगे रखिए। कश्मीर में जलती आग ऐसे ही बुझ पाएगी। वरना तो, CRPF, सेना हटाने और लगाने में अगले कई सौ साल बीत जाएंगे। और, कुछ निकलकर आने वाला नहीं है।

Friday, July 03, 2009

ये पिछड़ने का ब्लू प्रिंट है

तनाव, मुकाबला, आगे निकलने की दौड़, पिछड़ने की पीड़ा ये सब खत्म होने वाली है। न कोई आगे निकलने पर अब शाबासी देगा, न पिछड़ने पर कोई पीड़ा होगी। सब बराबर हो जाएंगे। तनाव तो बिल्कुल नहीं होगा। तनाव नहीं होगा तो, आत्महत्या भी नहीं होगी। ये फॉर्मूला है हमारे नए कानूनविद शिक्षामंत्री कपिल सिब्बल जी का।


सिब्बल साहब शिक्षा में बड़े-बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं। और, सबसे पहले जो, सबसे बड़े बदलाव की बात कर रहे हैं वो, देखिए। हाईस्कूल (10वीं) की बोर्ड परीक्षा खत्म कर दी जाए। क्योंकि, 10वीं की परीक्षा से बच्चे और उनके माता-पिता तनाव में आते हैं। ये तनाव इतना बढ़ जाता है कि कई बच्चे तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। इसका सीधा सा तरीका सिब्बल साहब ये लेकर आ गए कि परीक्षा होगी ही नहीं या वैकल्पिक होगी। जरा मुझे कोई बताए न कि 10वीं में कितने बच्चे होंगे जो, परीक्षा देने के लिए परेशान रहते हैं।


जहां तक 10वीं की परीक्षा में फेल होने के तनाव और उससे बच्चे और उनके माता-पिता के तनाव में रहने की बात है तो, इसमें कोई संदेह-बहस नहीं है कि ये संवेदनशील मामला है और बच्चों को फेल होने से रोकने की कोशिश होनी चाहिए। आत्महत्या का भाव मन में उपजे उसकी बजाए कोई तरीका खोजना होगा कि वो, और मजबूती से पढ़ाई करें, आगे निकलें। लेकिन, परीक्षा ही हटा देना ये तो, देश की पीढ़ी को पीछे ढकेलने जैसी बात होगी।



कितनी बड़ी विसंगति है कि एक तरफ हम बच्चों को इतना परिपक्व मानने लगे हैं कि कक्षा 6 से ही उन्हें यौन शिक्षा (sex education) देने की वकालत कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को इतना कच्चा समझ रहे हैं कि उसे फेल होने के तनाव से निजात दिलाना चाहते हैं। हर दूसरी बात पर हम ये जुमला सुनते रहते हैं कंपटीशन का जमाना है। और, अब यहां तक पहुंचने के बाद हम कह रहे हैं कि कंपटीशन खत्म कर दो।


परीक्षा में फेल होने पर 12वीं में भी बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं और, इंजीनियरिंग-डॉक्टरी की प्रवेश परीक्षा में फेल होने पर भी। क्या करेंगे सारी परीक्षाएं खत्म कर देंगे। और, सिब्बल साहब आप तो, राजनीति में हैं। यहां के कंपटीशन के लिए कितनी तैयारी करनी होती है। राजनीति में किस ग्रेड सिस्टम की वकालत करेंगे आप। आप वकील साहब हैं आपको तो, पता है जितनी अच्छी मुकदमे की तैयारी वकील जूनियर रहते कर लेता है। वही उसे बड़ा वकील बनने में मदद करती है।


मुकाबला छोड़ने वाले पीछे छूटते जाते हैं। अब चूंकि सिब्बल साहब सहमति के बाद ही इसे लागू करने की बात कह रहे हैं। इसलिए मैं भी सुझाव दे रहा हूं कि मुकाबला छोड़ने का नहीं मुकाबले के लिए और मजबूती से देश के बच्चों को तैयार करने का ब्लूप्रिंट तैयार कीजिए सिब्बल साहब। गलत कह रहा हूं तो, बताइए।

Thursday, July 02, 2009

नाम की राजनीति

बांद्रा-वर्ली सी लिंक, राजीव गांधी ब्रिज—ये दोनों नाम एक ही पुल के हैं। पहला नाम बांद्रा-वर्ली सी लिंक- वो, है जो पुल बनने की योजना बनने के समय से लोगों के जेहन में दर्ज है। भौगोलिक, स्थानीय आधार पर देश के पहले समुद्री पुल की असली पहचान बताता है।



दूसरा- राजीव गांधी ब्रिज वो, नाम है जो सिर्फ इसलिए रखा गया कि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सत्ता है। केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार है। स्वर्गीय राजीव गांधी की पत्नी सोनिया और उनका बेटा राहुल देश के सबसे ताकतवर लोग हैं। यही वजह है जो, मुंबई की नई पहचान पर राजीव गांधी का नाम लिख दिया गया।



अब ये राजनीति के लिए ही नाम रखा गया है तो, इस पर राजनीति तो होनी ही है। शिवसेना-बीजेपी इस पर राजनीति शुरू कर चुके हैं। लेकिन, उनकी राजनीति सिर्फ मीडिया में कुछ दिन दिखेगी-दब जाएगी। कांग्रेस की राजनीति पुल पर अमिट छाप छोड़ चुकी है। ठीक वैसे ही जैसे बेवजह देश के हर छोटे-बड़े शहर, हर छोटे-बड़े विकास की पहचान पर गांधी परिवार का नाम खोद दिया गया है। नामों से भारत की पहचान बने तो, पूरा भारत गांधी परिवार के राजवंशीय शासन की तरह दिखता है।



बीजेपी MLC ने तो मामला अदालत के सामने रख दिया है कि जब शिवसेना-बीजेपी की सरकार के समय पुल का नाम वीर सावरकर रखा गया था तो, अभी ये नाम क्यों बदला गया। उसका जवाब तो, अदालत से पहले मैं ही दे देता हूं कि जब सत्ता का इस्तेमाल करके वीर सावरकर नाम रखा गया तो, सत्ता की ही ताकत से उसके राजीव गांधी पुल बनने पर एतराज क्यों। लेकिन, मुझे भी राजीव गांधी के नाम पर इस पुल के होने से एतराज है। वो, इसलिए कि राजीव गांधी महाराष्ट्र, मुंबई, बांद्रा, वर्ली कहीं से किसी तरह से जुड़े होते तो, भी ये चल जाता। अच्छा भला नाम था- मुंबई के दो उपनगरों- बांद्रा-वर्ली की पहचान से जुड़ा हुआ।


भारतीय इंजीनियरिंग (अभियांत्रिकी) के इस नायाब नमूने पर जाने क्यों राजनीति की काली नजर गड़ गई। इसका नाम गेटवे ऑफ इंडिया जैसा-इंडिया गेट जैसा ही कुछ रख देते तब भी बेहतर था।

Wednesday, July 01, 2009

बस ऐसे ही

जनता का अब कोई दबाव नहीं है। और, सरकार को अगले 5 साल तक कोई खतरा नहीं है। इसलिए साढ़े तीन चार साल तक तो सरकार कड़े फैसले ले सकती है। कड़े फैसले मतलब जनता को जो पसंद नहीं आते। जैसे आज रात 12 बजे से पेट्रोल 4 रुपए और डीजल 2 रुपए लीटर महंगा हो जाएगा। अब सरकार बहुमत में न होती। कभी भी चुनाव होने का खतरा होता तो, सरकार ये खतरा तो मोल न ही लेती। लेकिन, अभी सब ठीक है।



खैर, पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ तो, हम टीवी चैनल वालों ने जनता के हित के लिए फ्लैश कर दिया कि आज आधी रात से पेट्रोल-डीजल महंगे हो जाएंगे। हम गाड़ी का वाइपर बदलवाने निकले थे। हमें पता चला तो, हमने भी सोचा चलो तेल भरवाते ही लौटते हैं। खैर, नजदीक के पेट्रोल पंप तक पहुंचे और तेजी से कार लगा दी। लेकिन, हम फंस चुके थे। आगे गाड़ियों की लंबी कतार थी और जब तक सोच पाते पीछे भी कारों की लंबी कतार लग चुकी थी। कोई कार वाला आगे निकलकर टैंक फुल न करा ले ये सोचकर हर कोई गाड़ी एक दूसरे से सटाए चल रहा था। एकदम मौका नहीं चूकना चाहता था इसलिए किसी की भी गाड़ी का इंजन बंद नहीं हुआ था। एक कार को तेल भराने में आधे से एक घंटे तो लग ही रहे थे। अब सोचिए एक टैंक में कितना तेल भरा होगा- 10-30 लीटर। एक कार वाले का हर लीटर पर भले ही 4 रुपया या 2 रुपया बच गया हो। देश का कितना रुपया फुंक गया होगा।



पेट्रोल पंप मालिक आकर असहाय भाव में बोले सुबह स्कूल जाने वाले बच्चों की गाड़ियों के लिए भी तेल नहीं होगा। आधी रात से पहले ही पंप ड्राई हो जाएगा। लेकिन, किसी को टैंक फुल कराने से रोकें तो, लड़ाई करें। ये सबसे ज्यादा कमाने वाले दिल्ली-नोएडा के लोगों का हाल था। अब कम से कम मैं तो दोबारा तेल के दाम बढ़ने की खबर सुनने के बाद तेल भराने नहीं जाऊंगा। हमारे साथी टीवी चैनल वाले भी पहुंच गए थे। सवाल पूछ रहे थे- क्या आपने सोचा था कि अचानक तेल के दाम बढ़ जाएंगे। पता नहीं किसी ने ये जवाब दिया कि नहीं- सोचा तो नहीं था। लेकिन, गलत किया ये लगभग पूर्ण बहुमत की सरकार है। बहुत से कड़े फैसले लेगी, तैयार रहिए।

Tuesday, June 30, 2009

पत्थर के सनम ... बड़ी भूल हुई

पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना ... बड़ी भूल हुई। फिल्म में ये गाना दो लोगों के निजी प्रेम संबंधों के उम्मीदों पर खरा न उतरने को बखूबी बयां करता है। लेकिन, गीत लिखने वाले को शायद ये अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि ये लाइनें किसी ऐसी शख्सियत पर बखूबी फिट बैठेगा जो, करोड़ो की उम्मीदों को तोड़ रही है। धूल-धूसरित कर रही है।


मनुवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद की विरोधी मायावती की मूर्तियां लखनऊ में हर थोड़ी दूर पर नजर आने लगी हैं। मायावती शायद देश की पहली नेता होंगी जो, जीते जी ही खुद अपनी मूर्तियां लगाने पर जुटी हैं। गांव-समाज में एक देसी कहावत अकसर सुनने को मिल जाती है फलनवा बड़ा आदमी रहा। अपने जीते जी मरे के बादौ क इंतजाम कई गवा। काहे से कि केहु ओकरे करै वाला नहीं रहा। मायावती भी कुछ गांव-समाज के उसी बड़े आदमी जैसा बर्ताव कर रही हैं। लेकिन, मामला सिर्फ ये नहीं है कि मायावती ने किसी से प्रेम नहीं किया-शादी नहीं की तो, उनकी फिकर करने वाला भी कैसे होगा। दरअसल, ये मायावती तो, उन करोड़ों लोगों की उम्मीद थी जिन्हें लगता था कि ये हमारे लिए बहुत कुछ करने के लिए शादी-ब्याह नहीं कर रही। अपना जीवन-करियर सब त्याग दिया।


ये वो मायावती थी जिसकी मूर्ति कहीं नहीं थी लेकिन, यूपी का करोड़ो दबा-कुचला अधिकारविहीन पीछे डंडा-झंडा लिए गर्मी-पानी-जाड़ा में मायावती के नाम का झंडा बुलंद करता घूम रहा था। फिर मायावती को ये करने की क्यों सूझी। इन करोड़ो लोगों पर मायावती को भरोसा क्यों नहीं रहा कि ये उनके मरने के बाद भी उनका नाम उसी बुलंदी पर रखेंगे जहां आज बिठा रखा है।


ये वो लोग थे जो, मायावती के बनाए अंबेडकर पार्क में इकट्ठा होते हैं। एक दिन की रोजी-रोटी त्यागकर लखनऊ पहुंचते हैं। मनुवाद की खिलाफत में मायावती के साथ खड़े होने के लिए गंगा का किनारा छोड़कर लखनऊ के अंबेडकर पार्क में बनी नहर को भीमगंगा बना देते हैं। गंगा से पवित्र मानकर उसी पानी से आचमन करते हैं।

अब देखिए मायावती क्या कर रही हैं। मायावती इन अधिकार विहीन लोगों को अधिकार दिलाने की मृगमरीचिका दिखाकर सत्ता में आ गईं। अधिकार छीनने वालों की जिस टोली के मुलायम के साथ होने का ढिंढोरा पीटकर ये सत्ता में आईं सत्ता में आते ही उन्हीं लोगों को मंच पर खड़ा कर दिया। और, उन अधिकार विहीन लोगों से कहा- ये आपके मसीहा हैं इन्हें अधिकार दीजिए ये, आपके अधिकारों के लिए लड़ेंगे।


हाथी इन अधिकार विहीन लोगों की ताकत था। फटे पुराने नीले कपड़े पर हाथी लहराता देख इन्हें अपनी ताकत का अहसास होता था। अब लंबी-लंबी कारों पर साटन-मखमल के कपड़े पर हाथी लहरा रहा है। इन्हें लगता है कि जैसे ठगे गए हों। लखनऊ में खड़े 60 हाथी इन पर भार बन रहे हैं। बहनजी और उनके साथ दूसरे अधिकार विहीनों के लिए लड़ने वाले नेताओं की मूर्तियों पर सिर्फ लखनऊ में 2700 करोड़ रुपए खर्च हो गए। और, कहते हैं न कि हाथी पालने से ज्यादा उसे खिलाना भारी पड़ता है। कुछ ऐसा ही है। यूपी के अधिकार विहीनों की मेहनत की कमाई का 270 करोड़ रुपए हर साल सिर्फ इन पत्थर की मूर्तियों और हाथिय़ों को खिलाने में (मरम्मत) बरबाद होगा।


गांव-गिरांव में इन अधिकार विहीनों की जमीन का पट्टा नहीं हो पा रहा है। रत्ती-धूर जमीन में ये परिवार चला लेते हैं। जमींदार टाइप के लोग इनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इनको गांव की जमीन दिलाने का वादा करने वाला मायावती अब यूपी की सबसे बड़ी जमींदार हो गई है। जमींदार है इसलिए जमींदारी भी कर रही है। सिर्फ लखनऊ में 413 एक़ड़ की इस जमींदारी कब्जे की जमीन पर पत्थर के हाथी, पत्थर की मायावती, पत्थर के कांशीराम और पत्थर के दूसरे नेता खड़े हैं जो, जमींदारी मिटाने की लड़ाई लड़ रहे थे। पूरा का पूरा वो आंदोलन पत्थर होता दिख रहा है जो, नोएडा के एक गांव की अधिकार विहीन सामान्य महिला को कुछ महीने पहले तक देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की जमीन बना चुका था।


और, ये आंदोलन खत्म होगा ऐसा नहीं है। सिर्फ अधिकार विहीनों की ही बात क्यों। मायावती की जिस सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में सारे समीकरण ध्वस्त कर दिए थे। वो, भी टूटेगा। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय नारा भर बनकर रहा गया है। मायावती के नजदीकी हिताया और सिर्फ उन्हीं का सुखाय। और, सबको सिर्फ इन पत्थरों में ही अपना सुख खोजना होगा। 413 एकड़ जमीन और 2700 करोड़ रुपए इतनी बड़ी रकम तो, थी ही कि अधिकार विहीनों (5 करोड़ 90 लाख लोग इस प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे हैं) के अधिकार कुछ तो मिल ही जाते।

बात सिर्फ लखनऊ की ही नहीं है। मायावती अपने आखिरी निशान हर जगह छोड़ देना चाहती हैं। दिल्ली से नोएडा घुसते ही लखनऊ जैसे ही गुलाबी राजस्थानी पत्थरों की ऊंची दीवार दिखने लगती है। करीब 3 किलोमीटर का ये पूरा क्षेत्र जंगल था-हरा-भरा था। इन पत्थरों की ऊंची दीवारों के बीच में पत्थर के हाथी और मूर्तियां हैं जो, गर्मी की चिलचिलाती धूप में चिढ़ पैदा करते हैं। मेरा मन इन मूर्तियों को ढहाने का होता है।


नोएडा के दूर-दराज गांवों में भी लोगों के रहने के लिए घर मिलना मुश्किल है। इनता महंगा कि आम आदमी तो, सिर्फ देखते हुए जिंदगी बिता लेता है। ये पत्थर के जंगल वहां तैयार हो रहे हैं जहां, ठीक सामने की जमीन पर करोड़ो के बंगले हैं। मायावती का मनुवाद विरोध एक चक्र पूरा कर चुका है। करोड़पति बंगले वाले और मायावती और उनके पहले के मनुवाद विरोध नेता पत्थर के ही सही लेकिन, पड़ोसी हैं। आमने-सामने रहते हैं। खैर, मैं भी यूपी में ही रहता हूं इसलिए ज्यादा हिम्मत नहीं करूंगा लेकिन, मायावती के पीठ पीछे ये धुन जरा ऊंची आवाज में सुनने का मन करता है।

पत्थर की मायावती ... तुझे हमने दलितों का खुदा जाना ... बड़ी भूल हुई ...

पीछे से बैकग्राउंड स्वर – भूल हुई तो, भुगतो


और, सुना-पढ़ा कि सुप्रीमकोर्ट अब इन मूर्तियों के बनने, जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल पूछ रहा है –

ऑर्डर .. ऑर्डर .. ऑर्डर .. ये अदालत का मामला है चलता ही जाए

Wednesday, June 10, 2009

कलावती दिल्ली आई है

कलावती परशुराम बांडुरकर दिल्ली में है। आज उसका दिल्ली में दूसरा दिन है। इसको नहीं पहचान रहे हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता। अरे देश के सबसे ताकतवर परिवार के नए पावर सेंटर राहुल बाबा की कलावती। राहुल बाबा संसद में खड़े हुए थे परमाणु करार पर सरकार का पक्ष रखने और लगे बोलने कलावती के बारे में। वैसे तो संसद में हंसोड़ों की कमी नहीं है लेकिन, परमाणु करार के बीच आई कलावती पर किसी को भी हंसी आ सकती थी। लेकिन, राहुल गांधी ने सबकी हंसी बंद कर दी थी ये कहकर कि मैं जिस कलावती की बात कह रहा हूं वो, विदर्भ में रहती है। उसका किसान पति कर्ज के बोझ से खुदकुशी कर चुका है।


उस वक्त तो राहुल की कलावती मशहूर हो गई। कलावती के घर बिजली पहुंचाने की उम्मीद और उसके जैसी कलावतियों की बेहतर जिंदगी की उम्मीद जगाकर राहुल की पार्टी बड़े दिनों बाद पुरानी कांग्रेस जैसे अंदाज में सत्ता में आ गई। ये अलग बात है कि परमाणु करार से देश की कलावतियों के घर में बिजली और खुशहाली पहुंचाने की उम्मीद ठीक वैसी ही थी जैसी, अकबर-बीरबल के किस्से में ठंडे पानी में खड़े गरीब के लिए अकबर के महल में जल रहे दीपक की गरमी या फिर बांस की चढ़ी बीरबल की खिचड़ी की हांडी। अब अकबर को जगाने के लिए तो, चतुर बीरबल था। आज के राजा गांधी परिवार को जगाने के लिए बीरबल कहां से लाएं। क्योंकि, इस परिवार के सामने बीरबल बने तो, सारा बल चला जाएगा।


वैसे कलावती की उम्मीद में देश की सत्ता भले ही कांग्रेस और उनके साथियों को मिल गई हो। खुद कलावती के इलाके से कांग्रेस और उनकी साथी एनसीपी का बुरा हाल हुआ। अब कलावती फरियाद करने आई है राहुल बाबा से कि मेरे 9 बच्चे कैसे जिएंगे। राहुल के वादे के बाद भी न तो घर मिला, न बिजली, न खुशहाली। राहुल तो, कलावती के भरोसे हीरो हो गए कि राहुल आम आदमी का दर्द जानते हैं। बड़े आदमी से जुड़ने का कलावती को फायदा ये हुआ कि देश क्या दुनिया - अमेरिका में पक्का जान गए होंगे क्योंकि, विदेशी तो वैसे भी भारत नंगे-भूखों की ही फोटो अपने यहां भारत की पहचान के तौर पर लगाते हैं- में भी जहां-जहां राहुल गांधी का एतिहासिक भाषण पहुंचा होगा सब जाए गए। लेकिन, नुकसान ये कि उसके गांव-तहसील का छोटा सा सरकारी अफसर भी कहता है कि जाओ राहुल गांधी को कहो-बताओ अपनी परेशानी और सुलझा ले समस्या।


लेकिन, अफसरों के दुत्कारने से नहीं एक NGO के हिम्मत (दिल्ली का टिकट. दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की व्यवस्था) देने से कलावती दिल्ली में है। दो दिन से अभी तो, उसे राहुल गांधी का समय नहीं मिला है। लेकिन, अब शायद एक कलावती की बात तो कुछ बन जाए। अभी तक कलावती के बारे में टीवी-अखबार में राहुल का बोला दिखा-छपा करता था। अब राहुल नहीं दिख रहे- अब कलावती का खुद का बोला टीवी-अखबार में दिख-छप रहा है। टीवी-अखबार में बड़ी ताकत होती है वो ऐसे समाज का कितना भला कर पा रहे हैं पता नहीं। लेकिन, कभी-कभी चमत्कार हो जाता है। बोरवेल में गिरा प्रिंस असली प्रिंस हो जाता है। अरे, लालू टीवी-अखबार में दिख-छपकर मंत्री तक बनने की कोशिश कर रहे हैं। कल भी तो संसद में --- देवी अर्ज सुन लो हमारी के अंदाज में -- सोनिया मैडम के सामने खड़े हो गए थे पुराने रिश्तों की याद दिलाने।



अब शायद टीवी-अखबार एक कलावती का भला करवा दे। राहुल को भी लगेगा कि इससे बढ़िया मौका क्या हो सकता है आम आदमी के साथ कांग्रेस के हाथ के नारे की मजबूती दिखाने का। दो-चार तसला मिट्टी फेंकते राहुल की टीवी पर चली तस्वीरों ने लाखों तसले मिट्टी राहुल के हाथों फेंकवा दी। टीवी-अखबारों में तो, तब से चुनाव तक तसला लिए मिट्टी फेंकते ही दिखते रहे। देखिए कब ये खबर आ जाती है कि राहुल बाबा कितने दयालु हैं कलावती के लिए खुद खड़े होकर घर बनवा रहे हैं।

Wednesday, June 03, 2009

देश हांफने न लगे

आज मीरा कुमार भारत की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष बन गईं। ये एतिहासिक घटना है। इसके बाद मीरा कुमार ने सबका धन्यवाद करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपने मंत्रिमंडल का सबसे परिचय कराने के लिए आमंत्रित किया। कई मायनों में ये लोकसभा एतिहासिक है। बरसों बाद कांग्रेस को फिर से इतनी सीटें मिली हैं। बरसों बाद फिर से राष्ट्रीय पार्टियां-क्षेत्रीय पार्टियों की दादागिरी का शिकार नहीं हुई हैं। दलित महिला लोकसभा स्पीकर के साथ आदिवासी डिप्टी स्पीकर भी बन गया।


लेकिन, जब प्रधानमंत्री अपने जंबो मंत्रिमंडल से सदन का परिचय करा रहे थे तो, वो भी एतिहासिक ही था। ये आजाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा मंत्रिमंडल है। यहां तक कि गठजोड़ के दबाव में बनी NDA और पिछली UPA सरकार से भी ज्यादा मंत्री। 78 मंत्री और उनका सरदार एक प्रधानमंत्री।


जब प्रधानमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के विभागों का नाम गिना रहे थे तो, वो लगभग हांफने से लगे थे। पूरा सदन हंस रहा था। मंत्री आनंद शर्मा भी हंस रहे थे लिस्ट सुनकर लेकिन, पता नहीं प्रधानमंत्रीजी और उनके मंत्रिमंडल को पता है या नहीं कि इतने बड़े बेवजह के मंत्रिमंडल पर देश हंस रहा है। छोटा मंत्रिमंडल बनाकर मिसाल बनने का बड़ा मौका गंवा दिया मनमोहनजी। मनमोहनजी आपके इतनेबड़े मंत्रिमंडल के तले दबा देश हांफ रहा है।

Tuesday, May 26, 2009

जान लीजिए राहुल ने कमाल कैसे किया

कांग्रेस की इस जीत ने कई इतिहास बनाए हैं। और, सबसे बड़ी बात ये कि इसका पूरा श्रेय मी़डिया उन राहुल गांधी को दे रहा है जिनको अभी कुछ समय पहले तक राजनीति का नौसिखिया-बच्चा कहा जा रहा था। फिर आखिर अचानक राहुल ने क्या कमाल कर दिया। दूसरी बात ये भी कोई कमाल किया भी है या सिर्फ महज ढेर सारे संयोगों के एक साथ होने ने राहुल के गाल के गड्ढे बढ़ा दिए। और, अपनी मां सोनिया की ही तरह उन्होंने बड़प्पन दिखाते हुए मंत्री बनने से इनकार कर दिया।


अब देखते हैं कि राहुल ने आखिर किया क्या जो, पूरा मीडिया और पूरी कांग्रेस राहुल गांधी के आगे नतमस्तक है। राहुल गांधी ने दरअसल कोशिश करके अनी उन सभी कमियों पर खुद हमला करने की कोशिश की जिसका इस्तेमाल उनके खिलाफ विपक्षी जमकर कर रहे थे। वंशवाद, सिस्टम की कमी, भ्रष्टाचार, नौजवानों को राजनीति में जगह न मिलना और सबसे बड़ा गांधी-नेहरू परिवार का राज। राहुल ने एक-एक करके इस सब पर चोट पहुंचाई। बहुत कम लोगों को याद होगा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय दिया गया राहुल का वो बयान जिसमें राहुल ने गैर गांधी कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहाराव को ही दोषी ठहराते हुए कहा था कि अगर उनके यानी गांधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो, बाबरी मस्जिद नहीं गिरती। सभी ने राहुल गांधी के इस बयान को बचकाना करार दिया था यहां तक कि विपक्षियों के हमले से डरी कांग्रेस भी इस मुद्दे को जल्दी से जल्दी दबाने की कोशिश करने लगी थी। लेकिन, वो पहला बयान था राहुल क राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश की शुरुआत की।


उस बयान से और कुछ हुआ हो या न हुआ हो। देश भर के मुसलमानों को एक सीधा संदेश गया कि मुसलमानों के हितों के रक्षा करने लायक गांधी परिवार ही था और आगे भी रहेगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसका असर नहीं दिखा। राहुल गांधी को फ्लॉप करार दे दिया गया था। इसका अंदाजा राहुल को पहले से ही था इसीलिए राहुल ने उसी समय साफ-साफ कह दिया था कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश विधानसभा 2012 और लोसभा 2009 का चुनाव लड़ रही है। राहुल ने लोकसभा के लिहाज से 100 ऐसी विधानसभा चुनीं और वहां यूथ कांग्रेस को मजबूत करने की कोशिश की। ये राहुल ही थे जिन्होंने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल नहीं होने दिया। अब सोचिए कांग्रेस के 21 सांसद दिल्ली पहुंच गए हैं। जबकि, रेशमी कुर्ते में टेलीविजन स्क्रीन पर मुस्कराते अमर सिंह कांग्रेस को उसकी हैसियत याद दिलाते घूम रहे थे और कुल जमा 15-20 सीटें ही देने को तैयार थे।



उत्तर प्रदेश के अलावा राहुल को संभावना दिख रही थी- मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब में। तीनों ही राज्यों में बीजेपी या फिर एनडीए की सरकार थी। कांग्रेस विपक्ष में थी- राहुल ने इस स्थिति का फायदा उठाकर लोकतांत्रिक तरीके से युवक कांग्रेस के चुनाव करा डाले। मौका मिलने से और पीठ थपथपाने से उत्साहित नौजवान कांग्रेस के साथ जुड़ गया। गुजरात में मोदी की जड़े काफी मजबूत हैं लेकिन, फिर भी कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ गया। मध्य प्रदेश में भी बीजेपी को झटका लगा। पंजाब में तो, अकाली सरकार के कर्म राहुल के लिए सोने पे सुहागा साबित हो गए।


एक और राज्य महाराष्ट्र- यहां तो हींग लगी न फिटकरी और राहुल की कांग्रेस के लिए रंग चोखा ही चोखा। खुद को असली शिवसेना बताने वाली बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने मुंबई की सभी सीटों पर एक लाख से ज्यादा वोट बटोरे हैं। राज्य में भर राज की सेना को इतने वोट तो नहीं मिले कि वो सांसद दिल्ली भेज पाएं लेकिन, इतने वोट जरूर मिल गए कि वो, कांग्रेस को एतिहासिक सफलता दिलाने की सीढ़ी बन गए।


राज ठाकरे जैसा काम आंध्र प्रदेश में देश के किसी भी राजनेता से ज्यादा भीड़ जुटाने वाले स्टाइलिश अभिनेता चिरंजीवी ने कर दिया। प्रजाराज्यम को मिले वोट ने चंद्रबाबू नायडू को पीछे धकेल दिया। कांग्रेसी मुख्यमंत्री वाई एस आर रेड्डी का सत्यम घोटाले जैसा पाप भी धुल गया। तमिलनाडु में भी हर चुनाव का चलता फॉर्मूला पलट गया। अम्मा के गठजोड़ की बढ़त श्रीलंका में तमिलों पर हुए सेना के हमले ने खत्म कर दी। काला चश्मा लगाए करुणानिधि को तमिल हितों की रक्षा करते दिल्ली साफ नजर आने लगी।


राजस्थान में विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी माता वसुंधरा का दिमाग नहीं सुधरा। राजसी ऐंठन से ऊबी राजस्थान की जनता ने लोकतांत्रिक रजवाड़े कांग्रेस के पक्ष में वोट कर दिया। इसके अलावा राहुल ने देश की जनता को संदेश दिया वो, काम कर गया। राहुल पॉश कॉलोनी के ऐसे नौजवान की तरह व्यवहार कर रहे थे जो, किसी दलित बस्ती के हक के लिए पॉश कॉलोनी से ही लड़ता दिखता है। ये फॉर्मूला काम कर गया।


चौथे दौर के चुनाव के बाद राहुल ने जिस तरह के परिपक्व राजनेता की तरह व्यवहार किया वो, निर्णायक साबित हुआ। राहुल ने कहा- उनके नाम के आगे गांधी-नेहरू नाम लगा हुआ है। इसे वो बदल नहीं सकते। लेकिन, उन्होंने वही कहा जो, उनके विरोधी उन पर हमले के लिए कहते हैं। राहुल ने कहा- वंशवाद लोकतंत्र के लिए घातक है और वो, पूरी कोशिश करेंगे कि इसे खत्म किया जाए। ये कहते वक्त उन्हें ख्याल तो जरूर रहा होगा कि पूरी यूथ ब्रिगेड जिसका हल्ला किया जा रहा है – किसी न किसी पुराने कांग्रेसी नेता के बेटे-बेटी की तस्वीरें दिखाकर मीडिया नौजवानों को उनका हिस्सा मिलने की बात कर रहा है – वो पूरी यूथ ब्रिगेड राजनीतिक विरासत ही आगे बढ़ा रही है।


दरअसल भले ही लोग कहें कि वंशवाद, भ्रष्टाचार, सिस्टम की खामी अब मुद्दा नहीं रह गया है। लेकिन, उसी तरह से मुद्दा है जैसे बड़ा से बड़ा शराबी ये नहीं चाहता कि उसकी औलाद नशे को हाथ तक लगाए। राहुल ने इस नब्ज को पकड़ा और अपने पिता की तरह भाषण दे डाला कि रुपए में दस पैसे भी आम लोगों तक नहीं पहुंचता। भाषण ही देना था दे दिया। गुलाम भारत ने सच्चे मन से राहुल की बात स्वीकार कर ली। कोई भला ये पूछने वाला कहां था कि जब आपका ही परिवार पिछले 62 सालों में बड़े समय तक देश पर शासन कर रहा था तो, मतलब यही हुआ ना कि बचे नब्बे पैसे का भ्रष्टाचार कांग्रेस की ही देन है।



राहुल ने कांग्रेस का संगठन खड़ा किया। क्योंकि, ये सिर्फ राहुल ही कर सकते थे। मनमोहन जैसे सोनिया माता के इशारे पर चलने वाले प्रधानमंत्री के होने की वजह से सत्ता तो वैसे ही उनकी दासी थी। इस पर जो रही-सही कसर थी वो, राहुल गांधी के भाई वरुण गांधी ने पूरी कर दी। मीडिया के The Other Gandhi वरुण गांधी ने भाषण देकर बीजेपी के लिए एक सीट पक्की की। बाकी देश की सरकार चलाने भर की सीट भाई राहुल के पाले में चली गई। एकमुश्त मुसलमान वोट के पड़ने से। मुस्लिम वोटों ने ही दरअसल लेफ्ट को कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा। हाथी पस्त हो गया। तो, साइकिल पंचर भले न हुई लेकिन, दिल्ली की दौड़ से बाहर कर दी गई। मुसलमान इतनी जबरदस्त पलटी खाए कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमानों की पार्टी बनाने का सपना दिखाने वाले MIM के औवैसुद्दीन ओवैसी हैदराबाद से सांसद होकर आए और राहुल के बगल बैठकर चाय की चुस्की ले रहे थे। आजमगढ़ से निकलकर पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की अकेली पार्टी बनने का दावा करने उलेमा काउंसिल का चिराग जलाने वाला भी संसद तक न पहुंच पाया।


लेफ्ट के पिछले तीस सालों के करम की खराबी शायद थोड़ा बहुत छिप भी जाती लेकिन, नंदीग्राम और सिंगूर में चली गोली और मुसलमानों का डर कि बीजेपी न आ जाए। कांग्रेस के लिए सोने पे सुहागा हो गया। बिहार में नीतीश को लेकर मुसलमानों में कोई डर नहीं था। इसीलिए वहां न तो राहुल का चमत्कार चला। न तो सोनिया-मनमोहन का अगुवाई वाली सरकार की लाभकारी योजनाओं (NREGS) का कुछ असर हुआ।


इतने सारे एक साथ बने संयोगों ने राहुल गांधी को इतना बड़ा बना दिया है कि पिता राजीव की कैबिनेट के साथी और कुछ दादी इंदिरा की कैबिनेट के कांग्रेसी नेताओं तक को राहुल ही तारणहार दिख रहा है। गुलाम भारत फिर स्तुतिगान में जुट गया है। लेकिन, यही स्तुतिगान राहुल गांधी के लिए असली चुनौती साबित होगा। कांग्रेस अपने रंग में फिर आने लगी है। लोकतांत्रिक तानाशाह कांग्रेसी नेता अपने हिस्से की मलाई चाटने के लिए हर चाल चलना शुरू कर चुके हैं। जब ऐसे सत्ता दिखने लगती है तो, कांग्रेस में सारा लोकतंत्र धरा का धरा रह जाता है। और, राहुल गांधी के लिए इसे जिंदा रखना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल थोड़ी चैन की सांस राहुल इसलिए भी ले सकते हैं कि अभी बीजेपी छितराई हुई है और तीसरे-चौथे मोर्चे को तो खड़े होने में बी कुछ वक्त लगेगा।

Sunday, May 24, 2009

ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हार है

बीजेपी के देश भर में तेजी से घटे ग्राफ पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली टिप्पणी आई- बीजेपी को बेहतर करना है तो, अपना चेहरा बदलना होगा। ये टिप्पणी कुछ वैसी ही मिलती-जुलती है जैसे दो साल पहले उत्तर प्रदेश में मायावती को पूर्ण बहुमत और बीजेपी को पहले से भी कम सीटें मिलने पर RSS के मुख्यपत्र ऑर्गनाइजर में कहा गया कि बीजेपी ने आधे मन से हिंदुत्व का रास्ता अपना लिया। और, मायावती ने इंदिरा गांधी के सॉफ्ट हिंदुत्व के फॉर्मूले से चुनाव जीत लिया। अब दो साल बाद भी RSS की ओर से वैसी ही टिप्पणी पर तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस कहावत से भी गई गुजरी लगती है। संघ ने तब भी नहीं माना था कि यूपी के जातियों में बंटे धरातल पर संघ के विचार फेल हुए हैं। और, इस तरह से सच्चाई से आंखें मूदने से RSS के और कमजोर होने का रास्ता बन रहा है।


लोकसभा चुनाव 2009 में बीजेपी की इस तरह की हार के बाद बीजेपी का असली चेहरा माने जाने वाले आडवाणी की राजनीतिक करियर भी खत्म हो गया। इस हार को समझने के लिए सबसे पहले उत्तर प्रदेश में 2007 विधानसभा और 2009 लोकसभा तक जो परिवर्तन हुए हैं उनको समझना होगा। उत्तर प्रदेश ही वो राज्य था जहां से कांग्रेस गायब हुई थी और उस जगह को बीजेपी ने काफी समय तक थामे रखा। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के उत्थान की वजह जो लोग सिर्फ राममंदिर आंदोलन को मानते हैं वो, शायद थोड़ी गलती करते हैं।


दरअसल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के स्थान पर आई बीजेपी - ये परिवर्तन कुछ वैसा ही परिवर्तन है जैसा यूपी में कांग्रेस के खिलाफ 1984 के बाद हुआ था। 1984 में भी इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति की लहर न आई होती तो, शायद कांग्रेस को चेतने का समय मिल जाता। लेकिन, 1984 में कांग्रेस को बहुमत मिल गया तो, गदगद कांग्रेसी टिनोपाल लगा कुर्ता पहनकर मंचों पर गला साफ करने में जुट गए। उत्तर प्रदेश की अंदर ही अंदर बदलती जनता का कांग्रेसियों को अंदाजा ही नहीं लग रहा था। इसका सही-सही अंदाजा RSS को लग रहा था। वजह ये थी कि कांग्रेसी नेता मंचों पर थे -- बरसों की विरासत के साथ और RSS लोगों के पास जमीन में जुटकर काम कर रहा था।


कांग्रेसी नेताओं से ऊबी जनता को राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान के नाम पर संघ ने अपनी विचारधारा से लोगों को जोड़ने की सफल कोशिश की। साथ ही पिछड़ी-दबी-कुचली जातियों को साथ लेकर अपना आधार बढ़ाने की कोशिश की। कोशिश काफी हद तक सफल भी रही। लेकिन, मंडल आंदोलन ने RSS और बीजेपी की काम बिगाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन, 1989 में RSS-बीजेपी ने समय की नजाकत समझी और मंडल-कमंडल का गठबंधन हो गया। दोनों को फायदा हुआ लोकसभा में जनता दल को 143 सीटें मिलीं और बीजेपी को 89। बीजेपी के लिए बड़ी उपलब्धि थी 1984 में सिर्फ दो संसद सदस्यों वाली पार्टी के पास लोकसभा में 89 सांसद हो गए थे। RSS की राजनीतिक शाखा उत्थान पर थी आगे संघ के प्रिय आडवाणीजी की रथयात्रा निकली और पार्टी और आगे पहुंच गई 1991 में अयोध्या (भगवान राम) ने बीजेपी को 119 सीटें दिला दीं।


बीजेपी उत्तर प्रदेश और पूरे देश में जम चुकी थी। कई राज्यों में सरकारें भी बन गई थीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की मेहनत काफी हद तक काम पूरा कर चुकी थी। 1999 में एक स्वयंसेवक के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद बचाखुचा काम भी पूरा हो गया। बस यहीं से बीजेपी के कांग्रेस बनने की शुरुआत हो गई। अब RSS ने बीजेपी से अखबारों-टीवी चैनलों की बहसों में किनारा करना शुरू कर दिया। स्वेदशी जागरण मंच, विश्व हिंदू परिषद जैसे संघ के सभी अनुषांगिक संगठन बीजेपी के खिलाफ अलग-अलग मुद्दों पर बीजेपी के खिलाफ नारा लगाने लगे थे। अब बीजेपी-RSS को ये पता नहीं लग पा रहा था
कि अंदर-अंदर जनता कैसे बदल रही है। पता तब लगा जब इंडिया शाइनिंग का नारा फ्लॉप हुआ और कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सत्ता में आ गई।


2004 में यूपीए का सत्ता में आना महज संयोग भर था। बीजेपी, कांग्रेस से बस थोड़ा ही पीछे थी। लेकिन, 2009 में कांग्रेस यूपीए के 262 में से 201 सांसद लेकर आई है। और, इस 201 के आंकड़े के पीछे उत्तर प्रदेश ही है जहां राहुल गांधी ने 2007 के विधानसभा में प्रत्याशी खड़ करते समय ही कह दिया था कि ये तैयारी हम 2009 लोकसभा और 2012 की विधानसभा की कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए ऊसर-बंजर कही जा रही सीटों पर भी राहुल ने नए कांग्रेसियों को टिकट बांटा। राहुल ने ही समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ को नकार दिया। गठजोड़ होता तो इतनी सीटें तो, सपा जीतती ही नहीं। और, जितनी जीतती उसका ज्यादा फायदा सपा को ही होता।


कांग्रेस देश भर में राष्ट्रीय पार्टी की तरह व्यवहार कर रही थी। बीजेपी NDA के सहयोगियों की गिनती बढ़ाने में लगी थी। 2007 विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ तो, भी RSS, बीजेपी के साथ कहीं नहीं दिख रहा था। बीजेपी का व्यवहार लोगों में ये भ्रम पैदा कर रहा था कि कहीं बीजेपी-समाजवादी पार्टी का कहीं अंदर ही अंदर कोई समझौता तो नहीं हो गया है। और, मायावती दहाड़ रही थी- मेरे सत्ता में आने के बाद गुंडे या तो जेल में होंगे या प्रदेश से बाहर। बचे-खुचे संघ के स्वयंसेवक भी बहनजी के कार्यकाल को मुलायम से बेहतर बता रहे थे। 2009 का लोकसभा का चुनाव शुरू हुआ तो, बीजेपी का बचा-खुचा कैडर वोटर भी पलट गया था। कैडर वोटर जाति के लिहाज से कहीं हाथी और जहां हाथी नहीं मिला वहां हाथ का साथ थाम लिया। क्योंकि, वो सपा के साथ नहीं जाना चाहता था। 2 साल में ही मायावती के साथ गुंडों की ऐसी फौज खड़ी हो गई कि उत्तर प्रदेश की जनता को लगाकि हाथी से जो आगे निकले उसी को वोट दो। न बीजेपी विधानसभा चुनाव में मुलायम के खिलाफ बने माहौल का फायदा उठा पाई थी न लोकसभा चुनाव में मायावती के खिलाफ बने माहौल का।


खैर, संघ-बीजेपी के इस तरह फेल होने से असली संघी आडवाणी की राजनीतिक पारी खत्म हो गई और इसी के साथ सबसे बड़ा संकट ये खड़ा हो गया है कि बीजेपी में एक तथाकथित दूसरी पांत है जो, सब ही पहली पांत में आना चाहते हैं। लेकिन, उनके पीछे के नेता और उससे नीचे कार्यकर्ताओं की कड़ी बनाने वाला कोई है ही नहीं। वजह भी साफ है संघ के ज्यादातर दिग्गज अब बीजेपी में हैं और संघ को ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि अब एजेंडा तय करने का काम संघ नहीं बीजेपी के ऊपर छोड़ देना चाहिए। लेकिन, मुश्किल वही कि एजेंडा तय करने वाले बीजेपी के नेता अब मंचों पर हैं और जमीन पर काम करने वाले बचे-खुचे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक स्वयंसेवा में लग गए हैं। कोई ऐसा प्रेरणा देने वाला नेता भी उन्हें नजर नहीं आ रहा है।


संघ की शाखाओं में आने वाले हर जगह घटे हैं। हाल ये है कि कई जगह शाखाएं बंद हो गई हैं और जहां चल रही हैं वहां बहुत सी शाखाओं में मुख्य शिक्षक के अलावा ध्वज प्रणाम लेने वाले भी मुश्किल से ही मिल रहे थे। वजह ये नहीं थी कि लोगों को संघ की विचारधारा अचानक इतनी बुरी लगने लगी थी कि वो शाखा नहीं जाना चाहते। वजह ये कि उन्हें ये दिख रहा था कि उन्हें शाखा से निकालकर बीजेपी विधायक सांसद के चुनाव में पर्ची काटने पर लगाने वाले RSS के प्रचारक सत्ता-सरकार बनाने बिगाड़ने की दौड़ को ही अपना अंतिम लक्ष्य मान बैठे हैं।


1991 से कमल निशान पर ही वोट डालता आ रहा पक्का संघी वोटर भी 2007 में पलट गया और इलाहाबाद की शहर उत्तरी जैसी सीट से भी कमल गायब हो गया, हाथ का साथ लोगों ने थाम लिया था। ये वो सीट थी जहां हर दूसरे पार्क में 2000 तक शाखा लगती थी और हर मोहल्ले में दस घर ऐसे होते थे जहां हफ्ते में एक बार प्रचारक भोजन के लिए आते थे। अब सुविधाएं बढीं तो, प्रचारकों को स्वयंसेवकों के घर भोजन करने की जरूरत खत्म हो गई। और, इसी के साथ संघ का सीधे स्वयंसेवकों के साथ संपर्क भी खत्म हो गया। सीधे संपर्क का यही वो रास्ता था जिसके जरिए संघ ने राम मंदिर आंदोलन खड़ा किया था। ये एकदम सही नहीं है कि राम मंदिर आंदोलन खड़ा होने से संघ से लोग जुड़े। संघ-बीजेपी के लोग भी इस भ्रम में आ गए कि जयश्रीराम के नारे की वजह से ही लोग बीजेपी-संघ के साथ खड़े हो रहे हैं। जबकि, सच्चाई यही थी कि जब संघ के स्वयंसेवक लोगों के परिवार का हिस्सा बन गए थे, जब लोगों के निजी संपर्क में थे, जब उनके दुखदर्द परेशानी में उनके साथ खड़े थे तो, संघ का हर नारा बुलंद हुआ। लेकिन, जब संघ के लोग सत्ता के लोभी होने लगे। जब संघ की शाखाओं में सिर्फ टिकटार्थी और सत्ता से सुख पाने के लोभी ही बचे। जाति के समीकरण संघ के काम पर हावी हुए तो, संघ से लोग कटने लगे।


अब 5 सालों के लिए यूपीए सरकार सत्ता में आ गई है। कोई अड़चन 5 साल तक इस सरकार को नहीं होने वाली। कांग्रेस बदल गई है। राहुल जैसा नौजवान चेहरा मिल गया है। साथ में एक नए खून का संचार पूरी ही कांग्रेस में हो गया है। अब अगर संघ सचमुच चाहता है कि बीजेपी आने वाले विधानसभा चुनावों और 2014 की लोकसभा में बेहतर करे तो, उसे लोगों से संपर्क जोड़ने होंगे और अपने मूल काम स्वयंसेवक तैयार करने पर ही जोर-शोर से लगना होगा। नेता तैयार करने का काम बीजेपी पर ही छोड़ देना ज्यादा बेहतर होगा। क्योंकि, अभी तो कुछ राज्यों में सत्ता है। नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह जैसे काम के प्रतीक मुख्यमंत्री हैं जो, राज्यों में विकास के नाम पर वोट जुटा पा रहे हैं। लेकिन, अगर संघ मूल काम से इस तरह हट गया तो, बीजेपी की हालत और खराब होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। क्योंकि, क्षेत्रीय पार्टियों की गंदी राजनीति से ऊबी जनता अगले कुछ सालों के लिए किसी राष्ट्रीय पार्टी पर ही भरोसा करने का मन बना चुकी है। जाहिर है इसका फायदा नौजवान कांग्रेस को होगा हर रोज थकती बीजेपी को नहीं।