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Thursday, April 12, 2012

नइकी दुलहिनिया!

नइकी, पहिले दिन ही आई तो, उसे पता था कि वो, सिर्फ दुबेजी का वंश चलाने के लिए लाई गई है। उस पर हर समय बड़कई के गुस्साने का भी डर था। देखने में बड़कई भी ठीक थी। लेकिन, बड़कई बड़ी थी तो, उमर का भी असर और सबसे बड़ी बात कि बड़कई बच्चा नहीं दे पा रही थी। नइकई, एकदम नई थी। दुबेजी से उमर में लगभग आधी। नई थी, एकदम्मै नई। दुबेजी की जमींदारी थी। पैतृक जमीन इतनी थी कि उसमें काम करने वाली परजा ही दुबेजी के बड़के कच्चे घर और पक्के डाक बंगले के चारो तरफ बस गई थी। लेकिन, चिंता बस वही थी कि आखिर तीन पीढ़ी से एक-एक बच्चे के जरिए चल रहा दुबेजी का वंश और उनकी जमींदारी का क्या होगा। सबसे ज्यादा चिंतित बूढ़ी फुइया थीं। खैर, इसी सब चिंता में नइकई आई। घोर दहेजी समाज में भी नइकी अपने बाबू के लिए गजब खुशकिस्मती निकली कि बिना दहेज शादी हुई। अउर त अउर दुबेजी का हाथ बंटाने के लिए नइकी का भाई भी साथ ही आया। यही दहेज देना पड़ा नइकी के बाबूजी को। नइकी के बाबूजी के लिए इससे बढ़िया क्या हो सकता था कि बिना खर्च किए जमींदार के यहां बेटी जा रही थी और साथ में बेटा भी जमींदार भले न हो लेकिन, जमींदारी संभालने के लिए तो, जा ही रहा था।

नइकी समझदार थी। नइकी काम सबसे संभालकर कर रही थी। बड़की की सेवा। और, दुबेजी के वंश में बढ़ोतरी। बड़की का हाथ-गोड़ मींजने से लेकर, सारी सेवा नइकी कर रही थी। और, इसके बदले उसे बड़की से अभयदान मिला था। क्योंकि, हिंदू संस्कार और कानून त बड़की, नइकी की इजाजत नहीं देते ना। इसीलिए बच्चा न पैदा कर पाने के बाद भी बड़की की इज्जत बनी हुई थी। बड़की भी बड़ी बन गई। अपनी नियति को ही मजबूती बना ली। दुबेजी की सेवा नइकी करेगी और, बाहर का सारा जिम्मा बड़की संभालेगी। वैसे, भी बड़की को पता था कि दुबेजी के पास जाने के लिए उसके पास कोई बहाना भी तो नहीं था। दुबेजी की नजदीकी के लिए ही तो, नइकी आई थी। नजदीकी रंग लाई औ तीन पीढ़ी से एक-एक बच्चे के जरिए चलने वाला दुबेजी का वंश तीन गुना बढ़ गया। अब बड़की ज्यादातर बाहर का ही काम संभालती है। नइकी अभी भी घर के भीतर ही ज्यादा रहती है। बड़की की सेवा भी वैसे ही करती है। हां, अब नइकी के बच्चे बड़े हो गए हैं। बड़की के साथ घर के बाहर के काम में बंटाते हैं। नइकी-बड़की दोनों एक दूसरे की पूरक हो गईं हैं। और, दुबेजी के लिए इससे बढ़िया क्या हो सकता है।

Wednesday, April 11, 2012

सरसों का तेल कैसे बनता है ?

गांव में हमारे दरवाजे पर पीटी जा रही सरसों
गांव खत्म होते जा रहे हैं। हैं भी तो, वो शहर होते जा रहे हैं। पहले गर्मी की छुट्टियों में हर बच्चा अपने गांव जाता था। और, करीब 2 महीने की शानदार छुट्टियां मनाने में पूरा गांव समझ लेता था। गांव के साथ गांव की बातें भी समझ लेता था। खेत भी समझ लेता था। खेती भी समझ लेता था। गाय-भैंस गोबर भी समझ लेता था। लेकिन, अब के बच्चों की न तो उस तरह से गर्मी की छुट्टियां होती हैं। न वो, गांव जाना चाहते हैं। न गांव समझना चाहते हैं। कईयों के तो, गांव ही नहीं रह गए। फिर ऐसे में शहरों के कॉन्वेन्ट स्कूलों में जब कोई संस्था सर्वे करती है तो, बच्चे दूध मदर डेयरी और अमूल की पैदाइश बताते हैं।

इस बार गांव गया तो, हमारी सरसों पीटी जा रही थी। लकड़ी के पटरा चार लकड़ियों पर लगा था। और, पूरी जमीन गोबर से अच्छे से लीप दी गई थी। और, दोनों तरफ से दो लड़कियां लगातार सरसों पीट रही थीं। इस प्रक्रिया में सरसों के दाने गोबर से लीपी जमीन पर गिर रहे थे। बाद में सरसों के खाली पेड़ किनारे करके सरसों के दाने बटोर लिए जाते हैं और इसी सरसों के दाने से सरसों का तेल तैयार। वैसे तो, ये बड़ी सामान्य घटना/ प्रक्रिया है। लेकिन, मैं यही सोच रहा था कि जब बच्चे गर्मी की छुट्टियों में गांव ही नहीं जाएंगे तो, गांव क्या समझेंगे।

Tuesday, April 10, 2012

खाबदान!


बवाली के मेहरारू क तेरही भोज

आखिरकार नंबरदार के घर से केहू नाहीं आए। जबकि, लागत रहा कि एकाध घर छोड़के एह बार सब बवाली के दुआरे खाए अइहैं। मैनेजर साहब से बाबूजी मिलेन त कहेन कि ई जरूरी है कि पूरा गांव एक साथे रहै। कउनौ मतलब थोड़ो न बा। अरे बाबूजी मतलब, नंबरदार का बेटवा। बाबूजी भोपाल नौकरी केहेन। जंगल विभाग म बाबू रहेन। इहीसे उनके घरे वाले सब बाबूजी कहै लागेन। रिटायरमेंट के बाद बाबूजी लउट के अपने गांव के दूसरे लोगन की तरह इलाहाबाद म घर बनवाएन औ हुअंई रहई लागेन। सारी जिंदगी गांव से बाहर रहइ के वजह से बाबूजी क लागत रहा कि का फायदा ई एक दूसरे से झगड़ा करे से। एक के घर मं कुछ सुख-दुख परै औ आधा गांव मुंह फुलाए बइठा रहै। तबै बाबूजी मैनेजर साहब से कहेन वइसेओ गांव में कइउ जने के घरे में रोज ढंग क खाए क जुगाड़ त रहत नाहीं औ उही मं कुछ परे-परोजने खाबदान का झंझट। लेकिन, नंबरदार के घरे से केहू नाहीं आए। जमीन-दुआर क लइके बवाली के घरे से मुकदमा जउन चलत बा। वइसे अब न बवाली अहैं, न नंबरदार। औ इ तो, बवाली के मेहरारू के मरै के तेरही क नेउता रहा।
खैर, ई गांव है। प्रतापगढ़ का ठेठ पारंपरिक पंडितों का गांव। ठसका ई कि हम सोहगौरा त्रिपाठी से श्रेष्ठ कउनौ बाभन होबै नाहीं करतेन। इही से बिटिया के बियाहे से लैके, हर काम मं मेल क श्रेष्ठ बाभन हेरै मं जिउ निकर जाथ। लेकिन, बभनई क ठसका तो, बराबर बना बा। बल्कि, सही मं तो, बढ़तौ जात बा। इही से पूरा गांव कभौ एक नाहीं भ। हमेशा गांव मं दुई पार्टी रही। ई अलग बात है कि राजनीतिक पार्टियों की तरह गांव की पार्टी के नेता भी अदला-बदली का खेल खेलते रहते थे। लेकिन, बहुत दिन से गांव में चल रहा दो पार्टी का झंझट इस बार टूटने की उम्मीद कुछ दिख रही थी। मास्टर साहब के दुआरे प हमेशा की तरह पार्टी मजबूत करने का कार्यक्रम जारी था। पता चला कि जेई क मेहरारू कहिन चाहे जउ होई जाए। मास्टर और मैनेजर के साथे कभौ न जाब। औ जेई क मेहरारू ई सब करत रहिन अपने कक्कू के कहे से। वइसे जेई क मेहरारू कक्कू का पानी गांव के झगड़ा म कइउ दाईं मजे से उतार चुकी रहिन। लेकिन, खाबदान के मामले में कक्कू की काम भर की सुन ली जाती थी। काहेसे के कक्कू इंटर कॉलेज मं लेक्चरर रहेन औ थाना भरे क पत्रकार। एसे तीन घरे क ठेका औनहीं क लगे रहा। केसे खाबदान करैक बा। केसे खाबदान तौरै क बा, ई सबकुछ। वइसे अब कक्कू रिटायर होइ ग अहैं औ कक्कू क थाने वाली पत्रकारिता भी कमजोर हुई। या इ कहें कि कक्कू की थाने वाली पत्रकारिता इसलिए भी कमजोर हो गई कि अब गांव में कई वकील हो गए। जेई के मेहरारू बीजेपी क गांव का नेता होई गईन। लेकिन, एह बार कक्कू रहबौ नाहीं केहेन औ कक्कू क असर घटि ग रहा। तो, बस जेई औ उनके मेहरारू कक्कू के कहे पे बवाली के मेहरारू के तेरही मं नाहीं गए औ नंबरदार के घरे से तो जाहिर है कि जब मुकदमा चलत बा तो काहे केहू आई।
हां, तबौ बवाली के मेहरारू क आत्मा गजब ऊपर कहूं अगर होई तो, हंसत होई कि सारी जिंदगी तो, पूरा गांव उनके दुआरे जाए से बचत रहा औ खाबदान जोड़ै खातिर उनकै तेरहिन गांव भरे क मिली। नंबरदार क पूरा घर औ कक्कू के साथे जेई औ उनकै मेहरारू बस एनहीं क छोड़के पूरा गांव बवाली के मेहरारू क तेरही क भोज खाएस। हियां तक कि जेई क भाए-बाप औ दादा के घरे से सब तेरही खाएन। दरअसल, गांव भरेक बवाली के मेहरारू के तेरही से नीक मौका मिलबौ न करत। बवाली के दुई बिटिया अहैं। उहौ दुइनौ बिटिया सोहगौरा त्रिपाठी के इज्जत क धोती पहराइ देहे रहिन। इही से दुइनौ बिटिया क गांव मं केहू पसंद नाहीं करत रहा। बड़की बिटिया नर्स रही औ एक बस कंडक्टर से बियाह कइ लेहेस। नाम से साधु। लेकिन, बवाली के बिटिया के पहिले 2-3 बियाह केहे रहा। औ छोटकी क खुदै बवाली दुआह केहे रहेन। छोटकी के मंसेधू का नाम विष्णु। वइसे विष्णु क पहली मेहरारू मरि ग रही। औ बवाली क छोटकी बिटियी ननियउरे मं इतना बवाल मचाए रही कि जल्दी से बियाह करब जरूरी रहा औ विष्णु मिली गएन।
लेकिन, बवाली औ उनके मेहरारू क दुर्दशा देखा कि दुइनौ बिटिया जीतौ हैरान किहिन औ मरौ प दुइनौ बिटियन क मंसेधू नहिंयै आएन। हां, बवाली औ उनके मेहरारू क आत्मा क इतनै खुशी भ होई कि पूरा गांव, पड़ानन सहित उनके दुआरे आइके खाएस। पड़ानन श्रेष्ठ सोहगौरा त्रिपाठियों के गांव में पांडे जी लोगों का कुछ परिवार था। बवाली सारी जिंदगी भांग क गोला खाए के मस्त रहेन औ गांव मं बवाली केहूक याद आवत रहेन तो, सिर्फ भांग क गोला उनकै लाठी औ पलरी भ कचौरी खाए तक। या तो, फिर होली प फगुआ। होरी खेलैं रघुबीरा ...।  लेकिन, उही बवाली के मेहरारू के मरे प गांव लगभग एक होइ ग। अब पूरा गांव एक हौइ जाई तो, भला गांव कइसे रहि जाई। औ एक इहू से होइ लेहेन कि भाई कउनौ सोहगौरा के दुआरे थोड़ो न सब सोहगौरा इकट्ठियानेन। इकट्ठियानेन भले बवाली सोहगौरा के दुआरे लेकिन, नेउता त खियावत रहिन बवाली क दुइनौ बिटिया। उहै दुइनौ बिटियन जउन अपने समय मं सोहगौरन क धोती समाज में फहराइ देहे रहिए। होइ ग आधा-अधूरा खाबदान होइ ग। पूरा खाबदान एह गांव मं शायदै होए। इहै गांव है आजकल। अब बतावा काहे केहू गांव म रहे। जब अपने घर-परिवार के दुआरे खाए म एतना झंझट वा तो।

Thursday, April 05, 2012

उम्मीद तो, जगी है लेकिन,


दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर अन्ना

5 अप्रैल 2011 भारतीय इतिहास की कुछ उसी तरह की अहम तारीख है जैसे कि 15 अगस्त 1947 या फिर 26 जनवरी 1950। आजादी या गणतंत्र की तारीख से 5 अप्रैल 2011 की तारीख थोड़ा अलग मायने की है, अलग महत्व की है। आजादी और गणतंत्र की तारीखें ऐसी तारीखें हैं जिस दिन देश को अपनी आजादी और अपने गणतंत्र के होने का अहसास मिला। और, वो अहसास हमारा गर्व बना। क्योंकि, 15 अगस्त 1947 के बाद कम से कम सीधे तौर पर किसी विदेशी का हम पर शासन नहीं रहा और 26 जनवरी 1950 के बाद हमने खुद के बनाए संविधान के लिहाज से एक देश के तौर पर खुद को चलाना सीखा। 5 अप्रैल 2011 का भी महत्व अगर देखा जाए तो, इन दोनों ही तारीखों से कुछ कम नहीं है। लेकिन, 5 अप्रैल 2011 की तारीख अलग इस मायने में है कि इस दिन जो, उम्मीद की किरण दिखी थी वो, अब तक अहसास में नहीं बदल पाई है।
रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार मुक्त भारत की उम्मीद में जमे लोग
5 अप्रैल 2011 को, जो उम्मीद की किरण थी वो, थी भ्रष्टाचार मुक्त भारत की। 5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर पर किशन बाबूराव उर्फ अन्ना हजारे जब अनशन पर बैठे तो, अंदाजा ही नहीं था कि इस नए गांधी ने भारत की बेहद कमजोर नस पर इतने सलीके से हाथ धर दिया है। नब्ज पकड़ में आई तो, भ्रष्टाचार की बीमारी से पीड़ित हर भारतीय प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इस डॉक्टर के दवा के परचे की लाइन में खड़ा हो गया। लेकिन, भ्रष्टाचार की बीमारी दूर करने का दावा करने वाले डॉक्टर अन्ना हजारे की मुश्किल ये थी कि खुद के लिए भ्रष्टाचार की बीमारी का पक्का इलाज चाहने वाले हिंदुस्तानी दूसरे हिंदुस्तानियों के लिए खुद ही भ्रष्टाचार की बीमारी बढ़ाने का हर संभव प्रयास कर रहा था। देश में भ्रष्टाचार की बीमारी से लड़ते दिख रहे अकेले इस सीनियर सर्जन के साथ कुछ जूनियर सर्जनों की टीम भी बीमार भ्रष्ट भारतीयों के लिए उम्मीद की किरण दिखी। देश जागा। भ्रष्टाचार की बीमारी में बेसुधी की नींद ही कुछ ऐसी गहरी आई थी।
विकी पीडिया पर अन्ना हजारे का पृष्ठ बताता है कि वो, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले महारथी हैं। पद्मश्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित भारतीय नागरिक सम्मान पा चुके इस शख्स की ढेरों उपलब्धियां भी विकीपीडिया के इस पेज पर मिलेंगी। लेकिन, 5 अप्रैल 2012 को सवाल वहीं का वहीं खड़ा है कि क्या 5 अप्रैल 2011 भारतीय इतिहास में 15 अगस्त 1947 या फिर 26 जनवरी 1950 जैसी निर्णायक तारीख बन पाएगी। कुछ अतिभ्रष्टाचारियों को छोड़कर, पूरे देश की तरह हम भी उम्मीद से हैं। क्योंकि, थोड़े बहुत भ्रष्टाचारी तो हम सब हैं। लेकिन, न्यूनतम भ्रष्टाचारी होने के कारण हम जैसे लोग रिपोर्टिंग करते एक्टिविस्ट की भूमिका में आ गए थे। ये अन्ना के आंदोलन की ताकत थी।
इलाहाबाद विकास प्राधिकरण में रजिस्ट्री के लिए मारामारी
लेकिन, बीते वित्तीय वर्ष के आखिरी दिन इत्तेफाक से हम इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के दफ्तर में काफी समय रहे। और, जमीन की रजिस्ट्री की पीड़ादायी प्रक्रिया और अन्ना को चुनौती देते बाबुओं की फौज से जूझते आम आदमी को देखकर मन में फिर सवाल खड़ा हुआ कि 5 अप्रैल 2011 आखिर निर्णायक तारीख कैसे बन पाएगी। यही वो, आम आदमी था जो, जंतर-मंतर, रामलीला मैदान से लेकर अपने शहर के नुक्कड़, चौराहे तक अन्ना के साथ गला फाड़कर, मैं अन्ना हूं की टोपी लगाकर खड़ा था। वही आम आदमी अपनी खरीदी जमीन की रजिस्ट्री के लिए बाबुओं के सामने रिरिया रहा था। बाबुओं की कृपादृष्टि भर से वो, प्रसन्ना हो रहा था। आजादी के 65 साल बाद भी रजिस्ट्री का वही घटिया तरीका। वही स्टैंप पेपर पर अंगूठे के निशान, हस्ताक्षर से लेकर एक बेहद घटिया पेपर की रसीद से रजिस्ट्री हो जाने की संतुष्टि।
प्राधिकरण में रिश्वत के खिलाफ लगा सूचनापट्ट
31 मार्च 2011 को ADA यानी इलाहाबाद विकास प्राधिकरण की लिफ्ट तेजी से का सातवें, आठवें तल पर ही जा रही थी। सातवें तल पर रजिस्ट्री के डीलिंग क्लर्क के पावन दर्शन होने थे। और, आठवें तल पर एक 25-30 लोगों की क्षमता वाले कमरे में एक साथ 100-150 लोग कुछ छूट की उम्मीद में आखिरी रजिस्ट्री कराने के लिए धंसे पड़े थे। हालांकि, सातवें तल पर डीलिंग क्लर्क के कक्ष के बाहर ही एक बड़ा बोर्ड लगा था जो, साफ तौर पर इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के अन्नामय होने की बात सार्वजनिक तौर पर कह रहा था। उस सार्वजनिक सूचना पट्ट पर साफ लिखा था कि प्राधिकरण के किसी भी कार्य के लिए कोई भी अधिकारी, कर्मचारी सुविधा शुल्क/ रिश्वत न लेने के लिए वचनबद्ध है। लेकिन, इसी बोर्ड पर अन्ना के साथ खड़े अन्ना के घोर विरोधी आम आदमी, कर्मचारी में से किसी ने सुविधा शुल्क/ रिश्वत न लेने के लिए वचनबद्धता को लेने की वचनबद्धता में बदलने की कोशिश की थी। वैसे, कोई इस सूचना पट्ट पर नजर भी नहीं डालता क्योंकि, इससे तो, बनी बात बिगड़ जाएगी। और, अंदर पहुंचते ही प्राधिकरण के अधिकारियों, कर्मचारियों की ईमानदारी का नमूना मिलना शुरू हो ही जाता है।
चढ़ावा डीलिंग क्लर्क से शुरू होकर आखिरी रसीद काटने वाले चपरासी बाबू तक चढ़ रहा था। कोई सरकारी खजाने में जमा होने वाली जायज राशि भर देता तो, रजिस्ट्री के लिए बैठी बाबुओं की फौज में से किसी की करकराती, डराती आवाज सुनाई दे जाती। खर्चवा देबा कि अइसेन रजिस्ट्री होइ जाई। लाखन क जमीन लेब्या औ दुई चार सौ देए म आफत होइ जाथ। किसी तरह जिसकी रजिस्ट्री हो जा रही थी। वो, जैसे अपने सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के दर्शन जैसा अहसास पा रहा था। ऐसे ही अहसास अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार मुक्त भारत के अहसास की सबसे बड़ी बाधा हैं। 5 अप्रैल 2011 ने एक उम्मीद तो, जगाई है लेकिन, ये उम्मीद भ्रष्टाचार मुक्त भारत के संपूर्ण या फिर बहुमत के अहसास में कब बदलेगी ये बता पाना तो, शायद ही किसी के वश का होगा।

Saturday, February 25, 2012

चुनाव बाद फिर फूटेगा महंगाई बम !

देश में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और चार दूसरे राज्यों में चुनावी मौहाल के बीच ज्यादातर आर्थिक या फिर लोगों की जेब से ताल्लुक रखने वाले मसलों पर अच्छी खबरें ही आ रही हैं। ये समझने की बात है कि अचानक औद्योगिक रफ्तार से लेकर सेंसेक्स की चाल तक और महंगाई के बढ़ने की रफ्तार सब संभल कैसे गई है। मंगलवार, 14 फरवरी को शेयर बाजार के बांबे स्टॉक एक्सचेंज का अहम सूचकांक सेंसेक्स 6 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर बंद हुआ था। और, इसकी सबसे बड़ी वजह दिख रही है- महंगाई दर का तेजी से घटना और ब्याज दरों में कमी होने की उम्मीद। इसी दिन आए महंगाई दर के आंकड़े बता रहे थे कि महंगाई के बढ़ने की रफ्तार सात प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। ये 26 महीने में महंगाई दर के बढ़ने की सबसे कम रफ्तार है। तो, क्या बजट के ठीक पहले और यूपी चुनावों के समय आ रही इन शानदार खबरों के बूते हम भारतीय अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार फिर से दो अंकों की तरफ ले जाने वाला सपना देखना शुरू कर सकते हैं। चुनाव की मारामारी है तो, जाहिर है कि मीडिया के पास चुनावी मुद्दों के अलावा किसी खबर में बाल की खाल निकालने की समय भी नहीं है। लेकिन, शायद ये तस्वीर उतनी सुनहरी है नहीं जितनी दिख रही है।
5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले 16 नवंबर को तेल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल के दाम करीब 2 रुपए ये कहकर घटाया था कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटी हैं और इसलिए हम ये कीमतें घटा रहे हैं। हालांकि, इससे पहले 26 जून 2010 से पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार मिलने के बाद तेल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत करीब 48 रुपए से बढ़ाकर सत्तर रुपए प्रति लीटर के आसपास पहुंचा दी थीं। जून 2010 से जनवरी 2011 तक पेट्रोल का दाम इसी नीति के तहत 58 रुपए प्रति लीटर के ऊपर हो गया था। लेकिन, इसके बाद जनवरी 2011 से लेकर 14 मई 2011 तक पेट्रोल की कीमतें बिल्कुल भी नहीं बढ़ीं। सवाल ये है कि क्या उस दौरान कच्चे तेल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में घट गईं थीं या स्थिर थीं। तो, उसका जवाब है कि ऐसा बिल्कुल नहीं था।
दरअसल 18 अप्रैल से 10 मई तक पश्चिम बंगाल और दूसरे कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने थे और इस वजह से जनवरी से लेकर पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार मिलने के बावजूद तेल मार्केटिंग कंपनियां पेट्रोल के दाम बढ़ाने के बजाए पेट्रोल पर घाटा सहती रहीं। उसी दौरान अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल जनवरी के $93.87/ बैरल  से बढ़कर मई में $110.65/ बैरल तक पहुंच गया। लेकिन, राजनीतिक मजबूरी में सरकार ने तेल मार्केटिंग कंपनियों को जनता के टैक्स के पैसे से अंडररिकवरी देना ज्यादा मुनासिब समझा। न कि तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल के भाव बढ़ाने की इजाजत देना। और, इन्हीं 3-4 महीनों में पेट्रोल के दाम बढ़ाने की इजाजत न देने से तेल कंपनियों का घाटा पचास हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बढ़ गया। अप्रैल में तो, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $118.46/बैरल तक पहुंच गई। लेकिन, फिर भी सरकार ने कीमत नहीं बढ़ाईं।
कुछ हद तक पिछले साल जनवरी से अप्रैल-मई वाले हालात ही इस समय भी हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। और, सरकार इस समय पेट्रोल के दाम बढ़ाने की इजाजत तेल मार्केटिंग कंपनियों को देने का खतरा नहीं उठा सकती। केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस को लगता है कि उत्तराखंड, पंजाब में वो, बीजेपी और बीजेपी-अकाली गठबंधन से सत्ता छीन सकती है और यूपी में पहले से काफी अच्छा करेगी। ऐसे में मुस्लिम आरक्षण के लुभावने, मीठे चुनावी वादे के साथ वो, महंगे पेट्रोल की कड़वाहट जनता को देने से बचना चाह रहे हैं। वो, भी तब जब जनवरी में एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल $110.47/बैरल तक पहुंच गया है। दिसंबर में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव $107.20/बैरल था। यानी दिसंबर से जनवरी में कच्चा तेल करीब $3/ बैरल से ज्यादा महंगा हो गया है। लेकिन, तेल मार्केटिंग कंपनियां पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ा रही हैं।
सोमवार, 13 फरवरी को उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल के बीच में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के चेयरमैन आर एस बुटोला ने कंपनी के तिमाही नतीजों का एलान किया। उन्होंने बताया कि पेट्रोल पर तेल मार्केटिंग कंपनियों का घाटा तेजी से बढ़ जा रहा है। लेकिन, पत्रकारों के बार-बार पूछने पर भी वो, ये नहीं बता सके कि हर 15 दिन में समीक्षा के बावजूद अभी तक पेट्रोल के दाम क्यों नहीं बढ़े। जनवरी से अब तक पेट्रोल पर सिर्फ इंडियन ऑयल को ही 362 करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है। जाहिर है दूसरी तेल मार्केटिंग कंपनियों का घाटा मिलाकर ये रकम और ज्यादा होगी। और, इसकी भरपाई जनता की गाढ़ी कमाई से वसूले गए टैक्स से ही की जानी है। तो, फिर ये रकम सीधे पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर ही सरकार क्यों नहीं वसूल लेती। जवाब साफ है अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री हैं तो, क्या हुआ। अर्थनीति पर राजनीति भारी पड़ ही जाती है। अब कम से कम 6 मार्च यानी मतगणना के दिन तक तो, पेट्रोल महंगा नहीं ही होगा। लेकिन, इसके तुरंत बाद पेट्रोल के दाम कम से कम 3 रुपए लीटर बढ़ना तय है। वो, भी तब जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल और महंगा न हो। और, उसकी उम्मीदें कम इसलिए हैं क्योंकि, भारत और जॉर्जिया में हमले में जिस तरह से ईरान के तार जुड़ रहे हैं। और, यूरोपीय, अमेरिकी देशों के साथ तनाव बढ़ रहा है। उससे कच्चे तेल के सस्ते होने की उम्मीदें कम ही हैं।
देश पहले से वित्तीय घाटे से जूझ रहा है। खुद वित्त मंत्री कह चुके हैं कि वित्तीय घाटा संभालना उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ऐसे में अर्थनीति पर भारी राजनीति की वजह से ये जो, पेट्रोल की कीमतों का घाटा सरकारी खजाने को चोट पहुंचाएगा उससे मुश्किल और बढ़ेगी। फिर पेट्रोल के दाम बढ़े तो, कुछ न कुछ महंगाई बढ़ेगी ये समझने के लिए अर्थशास्त्री होने की तो, जरूरत ही नहीं है। और, अगर दूसरी महंगाई नहीं भी बढ़ी तो, हर रोज चलने वाले लोगों- स्कूटर से लेकर कार तक- का पेट्रोल बिल तो, बढ़ ही जाएगा। उस पर रिजर्व बैंक के ब्याज घटाने का असर तुरंत तो, होने से रहा। क्योंकि, एक साथ आधा प्रतिशत से ज्यादा तो, ब्याज घटेगा नहीं और बैंक उसको ग्राहकों तक पहुंचाने में कम से कम महीने भर तो, लगा ही देंगे। और, अगर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल और महंगा करना पड़ा तो, सीधे महंगाई की मार और डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी की वजह से सरकारी खजाने पर चोट बढ़नी तय है। और, तब धड़ाधड़ भारतीय शेयर बाजार में रकम लगा रहे विदेशी निवेशक कितनी देर तक सेंसेक्स-निफ्टी थामेंगे वो, देखने वाली बात होगी। क्योंकि, सेंसेक्स में दिसंबर से अब तक करीब बीस प्रतिशत का मुनाफा उन्हें साफ दिख रहा होगा। चुनावी राजनीति और लुभाने वाली खबरों का ये कथित संयोग अर्थव्यवस्था को मुश्किल राह पर ले जाता दिख रहा है।

(ये लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है।)

Saturday, January 28, 2012

वाह रे भारतीय लोकतंत्र !

सर दर्द, बदन दर्द, सर्दी, जुकाम और ऐसे सारे दर्द के लिए क्रोसीन या ऐसी दूसरी टैबलेट (गोली) पर रोक लगाने की बातें हो रही हैं। देखिए कब तक 'वोट दर्द' के लिए राजनीतिक पार्टियों की ओर से दिए जा रहे टैबलेट (छोटा कंप्यूटर) पर प्रतिबंध लगता है। अन्ना बाबा देखो और समझो ! इस देश में चुनाव में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं है। न ही किसी पार्टी के विजन डॉक्यूमेंट में, न किसी पार्टी के घोषणापत्र में और न ही वोटर के लिए वोट देते समय।

Thursday, January 19, 2012

बीजेपी के लिए उमा फैक्टर कितने काम का ?

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी राजनीति बिल्कुल कारोबार की तरह कर रहे हैं। कब, कहां, कितना और किसका निवेश करना है। ये इससे तय करते हैं कि उस निवेश से कितना मुनाफा हो पाएगा। बड़ी कंपनियां, बड़े कारोबारी अकसर बड़े निवेश लंबे समय के मुनाफे और हित को ध्यान में रखकर करते हैं लेकिन, नितिन गडकरी राजनीति में शायद बड़े हो नहीं पाए हैं। इसीलिए छोटे हित और छोटी अवधि के हितों के मुताबिक, फैसले कर रहे हैं।
2-5 सीट जिताने के समीकरण के आधार पर दागी- भ्रष्टाचारी, अपराधी- चलेगा। क्यों, नजर इसी विधानसभा चुनाव पर जो, है। ऐसी ही 2-2, 5-5 सीटों के आधार पर गडकरी की बीजेपी हो सकता है कि यूपी में 51 से आगे कुछ सीटें जीत ले। लेकिन, कांग्रेस या क्षेत्रीय पार्टियों को जिन मुद्दों पर बीजेपी घेरती थी। उनमें से कोई भी मुद्दा अब बीजेपी के पास नहीं है। वजह, छोटे और छोटी अवधि के हितों के लिए गडकरी ऐसे कर्जे ले ले रहे हैं जो, शायद उतार पाना इस राजनीतिक कंपनी भारतीय जनता पार्टी के लिए संभव नहीं होगा। भले ही ये राजनीतिक कंपनी फिलहाल की चुनौती पार कर ले। गडकरी संघ प्रमुख भागवत की पसंद हैं। और, संघ स्थापना से लेकर अब तक कभी हड़बड़ी में नहीं दिखता। कभी ऐसे फैसले नहीं लेता, न अपने स्वयंसेवकों को ऐसे फैसले लेने के लिए उकसाता या कहता है कि वो, छोटी अवधि के हित तो, हो जाएं। लेकिन, लंबे समय की साख को खतरा पहुंचा दे। लेकिन, उसी संघ के पूर्ण समर्थन वाले नितिन गडकरी ये पता नहीं क्यों समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाहते।
इतने बड़े आंदोलन के बाद का चुनाव था। लेकिन, नितिन गडकरी के शॉर्ट टर्म निवेश और मुनाफे वाले फैसलों से बीजेपी पहले ही पिछड़ गई। अब भ्रष्टाचार, अपराध का कर्ज लेकर उमा भारती को बीजेपी की यूपी यूनिट के सीईओ की दौड़ में फिर से लगा दिया। उमा भारती नितिन गडकरी से अति प्रसन्ना थीं कि किसी तरह राजनीतिक संक्रमण सम्मान पूर्वक गडकरी ने खत्म करने में मदद की और उन्हें बीजेपी में ले आए। फिर बेहद नाराज हुईँ कि सारा कार्यकर्ताओं का जोश खत्म कर दिया। कार्यकर्ता छोड़ गडकरी दूसरी पार्टी के लतियाए लोगों को टिकट देने में जुट गई। उमा भारती ने चुनाव प्रचार से दूर तक रहने की बात कर दी। बादशाह सिंह और बाबू सिंह कुशवाहा के खिलाफ पूरा दम लगाकर भी उमा भारती गडकरी के फैसले को बदल नहीं सकीं। और, अब आखिरकार गडकरी ने कारोबारी कौशल दिखाते हुए उमा भारती को मना लिया कि वो, चुनाव लड़ें।
राजनीतिक जमीन बचाने के संकट से जूझ रहीं उमा भारती के पास शायद कोई विकल्प नहीं है। इसीलिए उमा ने मान भी लिया। लेकिन, अब संघ सोचे कि ऐसे छोटे हितों वाले फैसले से गडकरी बीजेपी को क्या बना रहे हैं और, क्या उसमें संघ परिवार से निकले कार्यकर्ताओं के लिए जगह बचेगी। और, जगह बचेगी भी तो, क्या मजबूर संघ विचार के नेताओं के लिए ही। संघ विचार-परिवार के नेताओ को मजबूर करके ही बीजेपी में लाना है तो, फिर बीजेपी की जरूरत ही क्या है। इस सवाल पर संघ को अच्छे से सोचना होगा।

Tuesday, January 10, 2012

ये कौन सी बीजेपी बना रहे हैं गडकरी?

बीजेपी नेता विनय कटियार के साथ मुस्कुराते बाबूसिंह कुशवाहा
देसी कहावत है कि ऐसा काम कभी मत करो कि धन भी जाए और धर्म भी जाए। लेकिन, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह के फैसले लिए हैं उसे देखकर तो, यही साबित होता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की आहट मिलते ही नितिन गडकरी ने उमा भारती को पार्टी में शामिल कराकर एक अच्छा संकेत दिया था कि अब कम से कम बीजेपी में चेहरा कौन है- इस सवाल के संकट  से तो बचा जा सकेगा। और, उमा भारती की बीजेपी में वापसी से तेजी में एक बदलाव ये देखने को मिला था कि बीजेपी का कैडर जो, 2007 की करारी हार के बाद और फिर लोकसभा चुनावों में पिछड़ने के बाद चुपचाप घर बैठ गया था, काफी हद तक उठ खड़ा हुआ। लगा कि एक राज्य के नेता से देश के नेता बन गए गडकरी ने खुद को उस लिहाज से फैसले लेने के लिए तैयार कर लिया है और यूपी की जंग जीतकर या सम्मानजनक संख्या लाकर वो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत की पसंद को सही साबित कर देंगे। नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश में जहां भी बैठक की, सभा की, कार्यकर्ताओं से साफ कहा कि टिकट में किसी की नहीं चलेगी। नेताओं की परिक्रमा मत करिए जो, 2007 के बाद 5 साल विधानसभा में रहा होगा। सर्वे में उसकी स्थिति जीतने की दिखेगी तो, टिकट उसके घर भेज दिया जाएगा। लगा कि गडकरी बीजेपी में रामराज्य लाने जा रहे हैं। लेकिन, नितिन गडकरी पर शायद कारोबारी अंदाज में नफा-नुकसान का गणित समझने की आदत ऐसी हावी हुई कि वो, राजनीतिक नफा-नुकसान का गणित समझने में अब नाकाम से दिख रहे हैं। बीजेपी अभी भी प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं और भ्रमित नेताओं वाली पार्टी ही बनी हुई है।
उत्तर प्रदेश में 2007 में 51 सीटें थीं। बीजेपी तीसरे नंबर की पार्टी थी। लेकिन, उस चुनाव की अच्छी बात ये थी कि करीब 70-80 सीटों पर एकदम नए प्रत्याशी पार्टी ने उतारे थे। ये वो, प्रत्याशी थे जो, परिषद के रास्ते भारतीय जनता युवा मोर्चा में काम कर रहे थे। इन प्रत्याशियों में कुछ ने अच्छे वोट पाए, कुछ कम अच्छे वोट हासिल कर पाए। लेकिन, इन प्रत्याशियों ने इस भरोसे कि अगली विधानसभा में उन्हें ही टिकट मिलेगा पांच सालों तक विधानसभा नहीं छोड़ी। और, खराब विधानसभा में भी पार्टी को इस स्थिति में ला दिया कि बूथ स्तर तक बीजेपी का कार्यकर्ता 90 के दशक की तरह नहीं तो, उसके आसपास दिखने लगा। ये वो नेता थे जो, परिक्रमा की राजनीति नहीं कर रहे थे। पूरी प्रदेश बीजेपी के कार्यकर्ता, नेता बिहार की तर्ज पर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के सर्वे फॉर्मूले के हिट होने की उम्मीद में खुश थे। लेकिन, जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते गए नितिन गडकरी के कॉर्पोरेट स्टाइल के फैसले पार्टी पर भारी पड़ते दिखने लगे। कम उम्र गडकरी से उम्मीद लगाए बैठे बीजेपी के युवा नेताओं को सबसे ज्यादा निराशा हुई है। पहले से बीजेपी की बुनियाद मजबूत करने में लगे प्रदेश के संगठन मंत्री को चुनाव के ठीक पहले बिहार भेज दिया गया। उसकी भरपाई संजय जोशी को उत्तर प्रदेश में राजनीतिक जीवनदान देकर करने की कोशिश की गई। लेकिन, गलतियों की शुरुआत हो चुकी थी। उमा भारती और संजय जोशी की अच्छी नेता और संगठनकर्ता की जोड़ी का इस्तेमाल ठीक से होने के बजाए उल्टा होने लगा। यूपी में बीजेपी- ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली- जिस बीमारी से ग्रसित थी वो, और संक्रामक हो गई।
इसी उठापटक में सारे दलों के ज्यादातर प्रत्याशियों की लगभग सूची आने के बाद भी बीजेपी की पहली सूची ही नहीं दिखी। बड़ी मुश्किल से पहली सूची जारी हुई। तब तक उमा भारती की नाराजगी इतनी बढ़ चुकी थी कि उन्होंने चुनाव लड़ने से ही मना कर दिया। उस पर उमा भारती के भारी विरोध के बावजूद बाबू सिंह कुशवाहा जैसे घोटालों के आरोपी विशुद्ध बसपाई के साथ बादशाह सिंह को पार्टी में लाने के फैसले ने आग में घी का काम किया। सीबीआई के छापे के बाद एक ही दिन में पहले मुख्तार अब्बास नकवी और फिर विनय कटियार को इस मामले पर सफाई देते नहीं बन पड़ रहा था। अब ये कहकर बचने की कोशिश थी कि कुशवाहा मायावती के विभीषण हैं। लेकिन, सवाल यही था कि अब उत्तर प्रदेश की जनता इस विभीषण को बीजेपी के किस राम के लिए यूपी की लंका सौंपने में मदद करे। नुकसान समझ में सबको आ गया था। उमा भारती के अलावा भी बीजेपी के सारे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली इस फैसले से बेहद नाराज थे। लेकिन, पिछड़े-अतिपिछड़े मतों के प्रतिक्रिया में विरोधी खेमे में जाने के डर से बाबू सिंह कुशवाहा अभी भी बने हुए हैं।
खैर, पार्टी को पीछे ले जाने वाले फैसले बढ़ ही रहे थे। गोरखपुर मंडल में तो, ठीक है कि बीजेपी के सांसद योगी आदित्यनाथ के कहने पर ही सारी सीटें बांटी गईं। ठीक है योगी का प्रभाव है वो, सीटें जिता सकते हैं। लेकिन, आजमगढ़ आते-आते तो, गजब हो गया- बीजेपी को लगा कि रमाकांत यादव के अलावा बीजेपी है ही नहीं। परिवार में ही बीजेपी रह गई। फिर भी ठीक है कि रमाकांत यादव बीजेपी की ही सांसद हैं। लेकिन, जौनपुर में क्या हुआ। बीजेपी की विधानसभा सीटें तय करने का जिम्मा पार्टी ने बीएसपी के सांसद धनंजय सिंह को सौंप दिया। माना जा रहा है कि धनंजय से बातचीत करने के लिए बीजेपी के नेता और नितिन गडकरी की हिट सर्वे टीम धनंजय से मिलती रही। ऐसे में कल्याण सिंह का ये आरोप दमदार लगने लगता है कि बीजेपी-बीएसपी में कुछ सांठगांठ है। आर्थिक सौदे के कल्याण सिंह के आरोप को अगर राजनीतिक ही मानें तो, भी। क्योंकि, बीएसपी से ठीक चुनाव के पहले निकाले गए बाबू सिंह कुशवाहा, बादशाह सिंह, दद्दन मिश्रा, अवधेश वर्मा और पिछले दरवाजे से धनंजय सिंह बीजेपी में हैं। कुछ टिकट भी पा चुके हैं। कुछ टिकट दिलवाकर ताकत दिखा रहे हैं।
ये राजनीतिक पार्टी है लेकिन, राजनीतिक समझ का अभाव साफ दिख रहा है। उत्तर प्रदेश और दूसरे चार राज्यों का विधानसभा चुनाव इस मायने में ऐतिहासिक है कि ये बहुत बड़े आंदोलन के बाद का चुनाव है। भले ही इस आंदोलन में कोई राजनीति न होने का दावा किया गया हो लेकिन, सच्चाई यही है कि भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ हुआ अन्ना हजारे का आंदोलन देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक भावना तैयार करने में कामयाब रहा है। और, लालकृष्ण आडवाणी ने राजनीति के संन्यास आश्रम वाली उम्र में भी इस बात को समझकर यात्रा निकाली जो, काफी हद तक अन्ना आंदोलन के अच्छे असर को बीजेपी के लिए लाने में कामयाब दिख रही थी। लेकिन, चुनाव में जिस तरह बीजेपी ने टिकट बंटवारा किया। भ्रष्टाचारियों-अपराधियों को टिकट बांटे। कहीं न कहीं उसका बुरा असर होता साफ दिख रहा है। गडकरी अपने गृह राज्य, देश और देश के सबसे बड़े राज्य में चुनौतियों में उलझ गए दिख रहे हैं।

फिर से 2007 में लौटें तो, उत्तर प्रदेश की जनता समाजवादी पार्टी के जंगलराज से त्रस्त थी। उस समय बीजेपी यही दावेदारी नहीं पेश कर पाई थी कि वो, समाजवादी पार्टी का विकल्प बन सकती है। परिणाम सबके सामने है। मायावती के साथ बीजेपी का वोटर चुपचाप ऐसे जुड़ गया कि मायावती देश में सोशल इंजीनियरिंग की उस्ताद बन गईं। फिर चुनाव है और चुनाव से ठीक पहले अगर संदेश ये जा रहा है कि बीजेपी-बीएसपी में सांठगांठ है या फिर बीएसपी से निकाल बाहर किए भ्रष्टाचारी-अपराधी बीजेपी में जगह पा रहे हैं तो, समझा जा सकता है कि परिणाम क्या आने वाला है। नितिन गडकरी का लक्ष्य 115-120 सीटों का है कहीं ऐसा न हो कि ये लक्ष्य सचिन की सौंवी सेंचुरी जैसा साबित हो जाए। और, सचिन को तो, हर मैच के कुछ दिन-महीने बाद मौका मिलता रहता है। यहां तो, मौका पांच साल बाद ही मिलेगा।

Wednesday, November 30, 2011

बंटवारे की राजनीति !

सूट पहने आधुनिक मुहम्मद अली जिन्ना
राजनीति भी गजब है। अलग-अलग संदर्भों में एक ही बात किसी को अच्छी या बुरी लगती है। मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान में उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा हासिल है। हो भी क्यों ना। आखिर पाकिस्तान की पैदाइश तो, उन्हीं के बूते हुई। बूते इसलिए कि बड़ी मेहनत मशक्कत करके भारत से अलग पाकिस्तान बनवा लिया। वैसे, जो ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं वो, यही हैं कि जिन्ना को अगर सत्ता सुख मिलने की गुंजाइश दिखती तो, वो सांप्रदायिक न होते। जिन्ना तो, सांप्रदायिक थे भी नहीं। ठीर नेहरू जैसे थे। जवाहर लाल नेहरू को तो, लोग सेक्युलर ही मानते हैं ना। तो, जिन्ना भी सेक्युलर ही थे। जिन्ना भी विलायती थे। सिगार पीते थे। सूट पहनते थे। अतिआधुनिक थे। ये कहां से इस्लामिक हो गया। लेकिन, जब सत्ता नहीं मिली तो, जिन्ना घोर मुसलमान हो गए। पाकिस्तान बना दिया। 
जिन्ना बड़ा बदमाश था। ऐसा हम भारतीय मानते हैं- सबसे बड़ी वजह उसने अपने राजनीतिक फायदे के लिए भारत-पाकिस्तान का बंटवारा करा दिया। लेकिन, अगर इस कसौटी पर कसेंगे तो, बड़ी मुश्किल होगी। आज के नेताओं को ले लीजिए। क्या कहेंगे। मायावती राजनीतिक फायदे के लिए यूपी 4 टुकड़े में करना चाहती हैं। ठीक यूपी चुनाव के पहले याद आया है। करीब पांच साल होने जा रहे हैं। पूर्ण बहुमत की मायावती जी की सरकार है। फिर भी कह रही हैं  कि बड़ा राज्य होने से प्रशासन और विकास में मुश्किल आ रही है। सत्ता में आते ही बांट दिया होता। अब तक 4 टुकड़े हुए यूपी का कुछ विकास भी हो गया होता।

शीला दीक्षित दिल्ली को 3 टुकड़ों में बांट रही हैं। बहाना, बहनजी की तरह ही शीला दीक्षित का भी है 3 टुकड़े MCD हुई तो, प्रशासन सुधरेगा, विकास होगा। ऐसे ही तो, राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, बाल ठाकरे भी बोलते हैं कि सिर्फ मराठी रहेगा तो, मुंबई के विकास का ज्यादा हिस्सा उन्हें मिलेगा। क्षेत्रवादी घोषित हैं। लीजिए अब यूपी चुनाव आया तो, राहुल गांधी भी कह रहे हैं कि यूपी के लोग भिखारी क्यों बने रहना पसंद कर रहे हैं। पता नहीं शायद वो, ये कहना चाह रहे हैं कि भिखारी ही बने रहना है तो, कांग्रेस राज में बने रहो। वो, भूल जाते हैं देश पर उन्हीं के हाथ वाली पार्टी और उन्हीं के पिता, नानी, परनाना का शासन लंबे समय तक रहा है। सत्ता ही है जो, नहीं मिल रही है तो, यूपी में राहुल गुस्सा जाते हैं। दिल्ली में ठंडा जाते हैं गुस्से से। बांटना ये सब चाहते हैं सत्ता मिली रहे तो, बांटना कोई नहीं चाहेगा। फिर जिन्ना और इन आज के नेताओं में कितना फर्क है।

Friday, November 18, 2011

काटजू और मीडिया को एक दूसरे का दोस्त ही बनना होगा

बड़ी मुश्किल होती है जब, आप किसी व्यक्तित्व के बेहद प्रभाव में रहें और उस व्यक्तित्व की बेबाकी की तारीफ करते रहें। और, अचानक ऐसा मौका आए जब वो, व्यक्ति आपकी भी कमियों पर बेबाक टिप्पणी करने लगे। उसकी बात सही होते हुए भी आप उस बेबाकी के खिलाफ ढेर सारे कुतर्क लाने की कोशिश करने लगते हैं। यहां संदर्भ है जस्टिस मार्कंडेय काटजू का। जो, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के ताजा-ताजा अध्यक्ष बने हैं। अध्यक्ष बनते ही जस्टिस काटजू का अदालत में फैसला सुनाने वाला अंदर का न्यायाधीश जग गया और उन्होंने अपने मन  में बनी और समाज के मन में तेजी से बसती जा रही इस धारणा के आधार पर बयान दे डाला कि मीडिया में कम जानकार लोग हैं। कुछ भी लिखते-दिखाते रहते हैं। अब तो, वो मीडिया को लोकपाल के दायरे में लाने की बात भी कर रहे हैं।

फिर क्या टीवी वाले पहले गरजे कि काटजू होते कौन हैं, उन पर टिप्पणी करने वाले। सबको पता है न कि अब काटजू साहब जज तो रहे नहीं जो, अवमानना होगी। काटजू साहब भी जितनी जल्दी ये समझ लें, उतना बेहतर है। मार्कंडेय काटजू ने यहां तक कह दिया है कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दायरे में टीवी मीडिया भी लाया जाना चाहिए। खैर, टीवी के संपादक तो, पहले से बीईए, एनबीए जैसी संस्थाएं बनाकर खुद को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के बराबर खड़ा कर चुके हैं। अब टीवी तो, छोड़िए प्रेस यानी प्रिंट के घरानों को भी काटजू की बेबाकी बर्दाश्त नहीं हो रही है। उनकी अध्यक्षता में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की पहले बैठक में काउंसिल के चार सदस्यों संजय गुप्ता (दैनिक जागरण), डॉक्टर आर लक्ष्मीपति (दिनामलार), वी के चोपड़ा (फिल्मी दुनिया) और पंजाब केसरी ने काटजू के वक्तव्य कि मीडिया कम जानकार लोग हैं, पर कड़ा विरोध जताया है।

ये वही टीवी, प्रिंट मीडिया है जो, न्यायाधीश रहते काटजू के ऑबजर्वेशंस का कायल था। सिस्टम पर काटजू की टिप्पणी मीडिया के लिए बहस का विषय देती थी और मीडिया से प्रशंसा भी पाती थी। लेकिन, अब जब वही काटजू मीडिया को आइना दिखा रहे हैं तो, मीडिया तिलमिला रहा है। मैं मीडिया में हूं और जानता हूं कि कई बार अपनी स्थिति बचाए रखने के लिए लोगों के बीच मीडिया की न बातों पर भी समर्थन करना पड़ता है जिसका मैं खुद विरोधी होता हूं। काटजू की टिप्पणी के मामले में भी ऐसा ही है। काटजू ने जो बातें कही हैं वो, ज्यादातर सही है। लेकिन, मीडिया शायद डर इसी बात रहा है कि अगर काटजू को तुरंत नहीं टोंका तो, आगे भी किसा मौके पर मीडिया, खासकर टीवी मीडिया की स्व नियंत्रण की अवधारणा को काटने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। काटजू मीडिया को लोकपाल के दायरे में लाने की बात इस आधार पर कहे हैं कि न्यायाधीश पर स्वनियंत्रण नहीं करते। उन पर भी महाभियोग चलाया जाता है। लेकिन, काटजू साहब को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मीडिया स्वनियंत्रण की बात इसलिए भी कहता है कि मीडिया पर नियंत्रण की कोशिशें अगर एक बार सफल हुईं तो, सरकार से लेकर हर तरह के प्रभावी लोग कैसे इस पर नियंत्रण की बेजा कोशिश करेंगे। ये सबको पता है। सरकार बार-बार मीडिया को चेतावनी देती ही रहती है। सच्चाई ये भी है मीडिया और न्यायपालिका पर नियंत्रण इसीलिए ठीक नहीं होता कि ये लोकतंत्र बचाने के लिए सचमुच जरूरी स्तंभ हैं।

अच्छी बात ये है कि काटजू साहब ये भी कह रहे हैं कि मीडिया के वो दोस्त हैं। उन्होंने टाइम्स नाऊ पर 100 करोड़ रुपए के जुर्माने को आदरपूर्ण तरीके से नकारते हुए इसका सबूत भी दे दिया कि काटजू वही वाले काटजू हैं जो, मीडिया को बड़े अच्छे लगते थे। जरूरत ये है कि इस बात को मीडिया भी समझे। क्योंकि, मीडिया तो, सरकार से लेकर सिस्टम में हर किसी का परम आलोचक ही होता है। और, इसी आलोचना के बूते समाज को स्वस्थ रखने का दावा भी करता है। इसलिए निंदक नियरे राखिए ... लागू करते हुए अच्छा है कि काटजू जैसा निंदक प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का चेयरमैन है। और, अगर काटजू कुछ कह रहे हैं तो, उनकी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया सुधार करके देनी चाहिए। यानी, खोखली बयानबाजी से नहीं काटजू की टिप्पणी का जवाब कार्रवाई से देना चाहिए।

और, ऐसा नहीं है। मीडिया पर भी दबाव है इसीलिए बीईए ने इस बार जो, निर्देश जारी किए उसके बाद टीवी चैनलों ने ऐश्वर्या के बच्चे को पैदा होते ही देश का सबसे चर्चित बच्चा नहीं बनाया। इसके लिए अमिताभ बच्चन ने मीडिया का धन्यवाद भी किया। इसलिए मीडिया और काटजू दोनों को एक दूसरे का दोस्त ही सचमुच बनना होगा। वरना तो, टिप्पणी और प्रति टिप्पणी में लोकतंत्र की शक्लो सूरत बिगाड़ने की कोशिश में लगे सत्ता से जुड़े लोग इसका फायदा उठा लेंगे।

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देखिए ये भी शायद अच्छा लगे

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